'तू आपन रहनि सुधरबऽ कि हम कहीं जा के डूबि - धसि जाईं?' - आजु सुनरी अपना मरद से बहुते कड़क सुर में पुछली।
'हमरा रहनि में का भइल बा, का बिगड़ल बा कि हम सुधारीं? - उहो सवाल पर सवाले दागि दिहलें।
'तहार रहनि नइखे बिगड़ल? बिहाने से साँझि ले कब्बो गाँजा, कब्बो भांग, कब्बो चरस त कब्बो दारू पी के बउराइल रहत बाड़ऽ। ई नीमन रहनि ह का? रोज घर में कब्बो हमरा साथे त कब्बो लरिकन के साथे मारपीट करत रहत बाड़ऽ, ई नीमन रहनि ह का? सब जमीन बिक गइल, अब त खाली घरे बचल बा, माँथ पर के टाटियो बेंचि के ओरवा देबऽ, तब मनबऽ का? आजु हमरा जबाब चाहीं, ना त हम ई घर छोड़े के एकदम्मे मन बना लिहले बानीं।'
'हमार रहनि तनिको खराब नइखे। हम जइसन बानीं, ठीक बानीं। हमरा ले ए गाँव में के नीमन रहनि के बा हो? तहरा जवन मन करे ऊ करऽ।'
सुनि के सुनरी के देह में आगि लागि गइल। घर छोड़े के प्रन मनहीं मन क लिहली। होत भिनुसारे लरिकन के सूतल छोड़ि के घर से निकल गइली। सड़क पर ठाढ़ रहली। बस आइल। इहो ना पुछली कि कहाँ जाई? बस में बइठि गइली।
कुछ दूर गइली। चुपचाप बस के सीट पर बइठल रहली। मन एन्ने से ओन्ने दउरत रहे। नइहर से अइला के बाद आजु ले के सगरे दुख - सुख सनिमा जइसन मन के पर्दा पर आवत - जात रहे। आँखि बन्द रहे लेकिन चेहरा पर लोर के पवनार लागल रहे। तले बुझाइल कि छोटका लरिकवा जागल बा आ माई - माई कहि के बोलावत बा। माई के ना देखि के जोर - जोर से रोवत बा। ओकर रोवाई सुनि के बड़को जागि गइल बा। उहो माई - माई के हँकार लगावत बा - 'ए माई, कहाँ बाड़े? हई बाबू जागल बाड़ें।'
माई आखिर माई होली। संतान खातिर कतनो दुख सहे के ताकत आ हिम्मत राखेली। अइसन बुझाते सीट से उठि के खाढ़ हो गइली। बोलली - 'ए ड्राइबर, बस रोकऽ। हमरा उतरे के बा। बस रोकत - रोकत अइसन लागे कि बहुत देर हो गइल। कूदि जइहें। जल्दी से उतरली आ गाँव के ओर भगली। एकसँसिए जा के घरहीं रुकली।
दुनू लरिका जागि के माई के जोहत जार - बेजार रोवत रहलें। बाप थोरे दूर पर लबनी से ताड़ी ढारत रहलें। दुनू लरिकन के सुनरी अँकवारी में बान्हि के जोर - जोर से रोवे लगली। कहली - 'बाबू, तहन लोग खातिर हम कइयो जनम अइसन दुख आ नरक में रहि सकत बानीं। अब हम कब्बो कहीं ना जाइबि हो।'
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