अपुसे के रार में
हेराइ गइल बखरा,
टुकी- टुकी घरवार
हाय रे बखरा।
देसा-देसी घूमि सब
शहरे पराइल
गाँव के पिरितिया
दुकहवाँ हेराइल
गाँव ना भइल
भइल ओझा जी के टपरा।
घर क इजतिया क
अस छेछालेदर
सुपवा के पिटला से
भागे ना दलिद्दर
खेलऽ ताटे दुखिया
कि भाँजऽता पएँतरा।
गँउँवाँ में जाइ
सुर-ताल बइठवनी
कुछ तूरि फेंकनी
आ कुछ के हटवनी
तवनो प'केतना
देखावे लोग नखर।
अपुसे के रार में
हेराइ गइल बखरा।
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लेखक परिचय:-
नाम: गुरुविन्दर सिंह
बलिया उत्तर प्रदेश

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