उहाँका जहें होखबि, भोजपुरी खातिर कुछ करत होखबि - डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह जी के चेहरा बिसरत नइखे। लागता हाले में उहाँसे मिलल रहीं। बहुत उमेदि रहे उहाँ से। अभी बहुत कुछ करेके रहे उहाँके। उमिरि भले ढेर भइल रहे बाकिर काम करे में ना लउके। काम में उहे तेजी। जिग्यासा लइकन के आ भूमिका गार्जियन के। अपने भलहीं जल्दिए गरमा जाईं बाकिर दोसरा के सुझाव दिहीं – “ए मिसिर जी, रउआँ लइकीवाला हईं। हइसे लइकावालन से बात करबि त मुश्किल होई। लइकावालन से तनी नइए के बात कइल जाला।” हमरा सोझे एगो लेखक के उहाँका समुझावत रहीं। जहाँ केहू नया भा पुरान साहित्यकार मिलल आ ऊ जो भोजपुरी में लिखत होखे त मान लिहीं कि ओहिजा चौधरी जी पहुँचल बानी। संक्षेप में इंटरव्यू लिया गइल। ई “भोजपुरी साहित्यकार दर्पण” के तेयारी चल रहल बा। कवनो अहंकार ना, एकदम लइकन के चुलबुलापन। बिलकुल सहज व्यक्तित्व। 
हमार पहिल भेंट जब उहाँ से भइल रहे तब चौधरी जी नया रहीं आ हम अभी नया-नया लिखे शुरू कइले रहीं। ओह घरी उहाँका नोकरी में रहीं। नीसन्ह दोहरी देहिं आ कड़क आवाज। हम सुरुए से संकोची आ विनम्र रहीं, अपना से बऽड़ से मुँह ना लड़ाईं, साइत एही से केहू के अप्रिय पात्र ना बनत रहीं। ओह घरी उहाँके आदेश रहे- “ए विमल ! हिंदी में ढेर लोग लिखता। तू एगो ना लिखबऽ त कवनो पहाड़ ना टूटि जाई हिंदी पर बाकिर भोजपुरी में लिखबऽ त माई के एगो करजा उतरी। तोहन लोग के भोजपुरी में खूब लिखेके चाहीं।” मतलब सुरुए से भोजपुरी साहित्यकारन के एगो पीढ़ी तइयार करे में उहाँ के जबरदस्त हाथ बा। लोगन के अइसे बोलल कम सुनले बानी। ज्यादातर लोगन के सोचे के एगो अलग ढंग होला- “बुझाता जइसे हमरा बेटा के बियाह होखे, लिखऽ भा भाँड़ में जा, हमरा का ?” 
पिछला कुछ साल से जो हम आरा जाइबि त उहाँ से मिले के कोशिश जरूर करबि। उहाँका रहबि त लागी कि आरा आइल सुफल हो गइल आ जो ना रहबि त फोने प ऑडर देबि कि हमरा घरे चलि जाईं आ फलाना-फलाना किताबि जरूर ले लेबि। अब त हमरा जाहींके बा। 
कुछ साल पहिले दिल्ली में एगो विश्व भोजपुरी सम्मेलन में उहाँसे भेंट भइल। ओहिजा कई गो साहित्यकार लोगन से भेंट-मुलाकात भइल। आसिफो भाई आइल रहन। चौधरी जी के एगो बऽड़ तकलीफ रहे कि आसिफ उनुका से ना मिलले। चौधरी जी नाटक का सङही गजलो के विशेषज्ञ मानत रहीं अपना के। हमरा कहला से आसिफ भाई गइले, मिलले उहाँसे आ अतना प्यार बरिसल उहाँके कि विमले अलोत हो गइले। हम मजाके में कहलीं आसिफ जी से- “लीं बिचवनिया भइला के नीक फायदा भइल हमरा। हमरो दू गो सुने के मिल गइल।“ फेरु हमनीका खूब ठठाके हँसलीं जा। ई कवनो व्यंग ना रहे, नु उहाँके अनादर। ई उहाँके अभिभावक रूप आ आत्मीयता के व्याजस्तुति रहे। उहाँसे जे भी कबो मिलल होई उहाँका आत्मीयता से बंचित ना रहल होई, हमार बिस्वास बा। उहाँके सुभाव क्रोध करेवाला ओह रिसियन के सुभाव रहे, जेकर पूरा जीवन समाज का फायदा खातिर समर्पित होत रहे। 
2014 के बाति ह। आरा आइल रहीं। चौधरी जी के फोन कइलीं कि आरा आइल बानी। उहाँका तब साइत धनबाद में रहीं। आदेश मिलल- “हमरा घरे चलि जाईं आ हमरा बहू से कुछ किताब आ नया आइल पत्रिका ले लेबि। हम लेके अइलीं। जब खोलिके देखलीं ता चका गइलीं। ओमें बिना पैकिंग तूरल एगो नया पत्रिका रहे। हम तुरते फोन कइलीं। उहाँका कहलीं कि रउरा ले जाईं। हमरा से ज्यादा राउर पढ़ल जरूरी बा। हम फोन कइके दुबारा मङा लेबि। ओमें गंगा प्रसाद ‘अरुन’ का संपादन में निकलेवाली एगो अनियतकालीन पत्रिको (लकीर) रहे। हम फेरु परेशान। दिल्लीवाली घटना के अभी दुइयो साल ना भइल होई आ कुल्हि भुलाके भोजपुरी खातिर अइसन समर्थन ? दरअसल पूर्वांचल एकता मंच, दिल्ली का ओरि से आयोजित विश्व भोजपुरी सम्मेलन खातिर हमनीका जहाँ ठहरल रहीं जा, बाद में पता चलल कि ओहिजा राती खा चौधरी जी आ अरुण जी में एह हद तक वाद-विवाद भइल रहे कि साधारन आदिमी त जिनिगी भर बात ना करी आपस में। बाकिर हमार परेशानी बेकार के रहे। चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह कवनो साधारन आदमी के नाँव ना रहे। एतना उमरदार भइला का बादो उहाँका सभ कुछ भुलाके फेरु पहिलहीं नियन संबंध बना लिहलीं। हमरा नइखे मालूम कि अपना व्यक्तिगत जिनिगी में उहाँका कइसन रहल बानी ( काहेंकि अतना करीब हम नइखी रहल।), बाकिर अतना त हम दावा से कहि सकतानी कि भोजपुरी का बढ़ंती आ ओकरा अस्मिता के रक्षा खातिर चौधरी जी हर तरह के अभिमान के कगरी करे से कवनो परहेज ना करत रहीं। का बूढ़ का लइका का सेयान; भोजपुरी से जुड़ल बात जो उहाँका कान में आ गइल त अब सभ अपने हो जाई, बिलकुल समउरिया। बिलकुल एगो असाधारन व्यक्तित्व। 
पाँच साल पहिले ‘माई’ के एकांकी विशेषांक निकलेवाला रहे। चौधरी जी के फोन आइल- “कवनो बंगला एकांकी के भोजपुरी में अनुवाद कऽ के भेंजीं।“ हम असमंजस में परि गइलीं। हम बंगाल में रहिके नौकरी जरूर करतानी बाकिर बंगला भाषा के इचिको ज्ञान नइखे, बस थोर-ढेर समुझि लिहींले। हमरा एह काम खातिर बंगला के कुछ साहित्य-प्रेमी लोगन के मदत लेबेके परल, तब जाके उहाँके आदेश पूरा कर पवलीं। ‘माई’ के एकांकी विशेषांक निकलल आ बहुत सुंदर आउर मूल्यवान। क्षमता ना रहलो पर केहू से लिखवा लेबेके क्षमता चौधरी जी में रहे। 
सोझो बात(कटु सत्य) बोले में चौधरी जी के केहूँ सानी ना रहे। एक बार उहाँका घरे बइठल रहीं। कुछ आउर लेखक रहन। हमरा से कम उमिरि के केहू ना रहे। एगो लेखक महोदय हमार पता आ फोन नंबर ऊहें का किताब पर लिखे लगलन, जवन उहाँका कुछे देर पहिले देले रहलीं। उहाँका साफ मना कऽ दिहलीं। ई नीमन बात ना हउवे। ई कुल अलग से कवनो कागज पर लिखेके चाहीं। कागज देत उहाँका जोड़लीं- बाहर रउआँ का करबि हम थोरे देखे जाइबि बाकिर कम से कम हमरा आँखि का सोझा त एकरा पर कुछ मत लीखीं, देखिके हमरा तकलीफ होई। 
अंतिम बार चौधरी जी से मिले खातिर जब हम आरा आइल रहीं त उहाँका आपन लिखल जतना किताबि रहे, अधिकांश के एकाध गो प्रति दिहलीं। जयघोष, शिव, ब्रह्मा, नीम, अनुमंता, धर्मी आ भोजपुरी साहित्यकार दर्पण (दूसरा भाग)। इहाँ तक कि भोजपुरी साहित्यकार दर्पण के ऊहो भाग हमरा के दे दिहलीं जवना में हमार जिक्र त रहे बाकिर ओकर एकही प्रति ओहिजा मिल पावल। उहाँका कई गो शोधो ग्रंथ देखवलीं जवनन में हमराके साहित्यकार का रूप में कोट कइल गइल रहे। ओह सभे शोध ग्रंथन के तइयारी में उहाँके भरपूर सहयोग रहे। हर बार से ज्यादा चर्चा ए पारी हमनी का बीचे भइल रहे। हम एगो नया पत्रिका निकाले के आपन योजना बतवलीं। बाकिर उहाँका ई कहिके मना ना कइलीं कि बहुत पत्रिका निकलत बाड़ी सन, उहनीके सहयोग करीं, नया काहें खातिर। चौधरी जी बहुत खुश भइलीं आ कहलीं- “रउँआ सभके त अब पूर्ण रूप से आ पूरा ताकत का साथे अब आइए जाएके चाहीं। आजु ओकरे जरूरत बा।“ 
पिछला कुछ साल से एकाध बार आरा जाए के संजोग त बनिए जाता बाकिर जबसे चौधरी जी परधाम के पयान कइलीं, अबहीं ले कदम ना उठल। सोचींले, कइसे जाइबि ओह आरा के बजाज गली में, जहाँ घर के अहाता त होई, घर-परिवार के लोगो होई बाकिर उहाँका ना होखबि। मन रुआँस हो जाता सोचिके बाकिर तबहूँ अचेतन में एगो बात कहीं ना कहीं हरमेश चलऽता कि उहाँका जहें होखबि, भोजपुरी खातिर कुछ करत होखबि। 
चौधरी कन्हैया प्रसाद सिंह जी साहित्य का लगभग हर विधा पर आपन कलम चलवले बानी। भोजपुरी माई के भंडार भरे में अपना ओरि से उठाइ ना रखलीं। भाषा से साहित्य तक के अलग-अलग पक्षन पर कहीं ना कहीं उहाँका बहस के केंद्र में रहल बानी। उहाँके ई नि:स्वार्थ साधना आवेवाला दिन में तब अउर साफ लउके लागी, जब उहाँ पर शोध कार्य खातिर विश्वविद्यालयन का सूची में बढ़ंती होखे लागी। 
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‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌लेखक परिचय:-
जन्म: बड़कागाँव, सबल पट्टी, थाना- सिमरी
बक्सर-802118, बिहार
जनम दिन: 28 फरवरी, 1962
पिता: आचार्य पं. काशीनाथ मिश्र
संप्रति: केंद्र सरकार का एगो स्वायत्तशासी संस्थान में।
संपादन: संसृति
रचना: ‘कौन सा उपहार दूँ प्रिय’ अउरी ‘फगुआ के पहरा’
संपर्क : 
मोबाइल 09831649817 
ई-मेल: rmishravimal@gmail.com
मैना: वर्ष - 7 अंक - 120 (अक्टूबर - दिसम्बर 2020)

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