डायरी: नीक-जबून (1) - डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

1.

अब लागऽता कि भोजपुरिहा बुद्धिजीवी एह बात के माने लागल बाड़े कि भोजपुरिहा अपना भाषा का प्रति काफी संकोची होले। एह संकोच का पीछे कवनो विधेयात्मक सोच कम, हीन बोध ज्यादा बा। जो केहू जान जाई कि ई भोजपुरी बोलेले त मानि ली कि अनपढ़ हवे। कारन चाहे जवने होखे बाकिर साँच त इहे बा। बाहर भीतर निकले-पइसेवाला आदमी त रोजे ई देख रहल बा। गैरभोजपुरी खास कर गैरहिंदीभाषी क्षेत्र में एकर सच्चाई नीमन से लउकेले। 
कुछ दिन पहिले आरा गइल रहीं। एगो रिक्शा प बइठले एक आदमी के इंतजार करत रहीं। रिक्शावाला कवनो शब्द के सही वर्तनी पुछलसि। हम ओकरा के दू गो वर्तनी बतवलीं एगो हिंदी आ एगो भोजपुरी खातिर। ऊ हिंदी वर्तनी पर त मूड़ी हिला लिहलसि बाकिर भोजपुरीवाली बात पर अचंभा में परि गइल। “भोजपुरियो में लिखाला का ?” एगो अजीब मुद्रा में हमरा ओरि ताकिके ऊ पुछलसि। 
ई प्रश्न भोजपुरी भाषा आ साहित्य का प्रचार-प्रसार के पोल खोले खातिर काफी बा। खाली कुछ लघु पत्रिका निकालि लिहला आ नेट पर पढ़ि-लिखि लिहला से भोजपुरी मानसिकता में अपेक्षित बदलाव संभव नइखे। एकरा खातिर सामाजिक संस्थानन के विशेष जागरूकता अभियान चलावे के परी। हमनी के अपना हर आमंत्रण पत्र, पोस्टर आदि में हिंदी का सङही भोजपुरियो में लिखे शुरू करेके परी। पहिले लोगन के ई त लागो कि भोजपुरी में लिखला में गँवारूपन नइखे, अपना भाषा का प्रति प्यार आ सम्मान बा। ई पहल पहिले हर जागरूक बनाम बुद्धिजीवी भोजपुरिहा के करेके परी। फेरु जब धीरे-धीरे ई फइल जाई त कवनो भाषण के जरूरत ना परी। 
अपना सभ भोजपुरिहा भाई बहिन लोग से हम ई निहोरा कइल चाहबि कि अपना हर आमंत्रण पत्र, पोस्टर आदि में भोजपुरी के भी इस्तेमाल करीं। तबे अपना संस्कृति के कुछ जरूरी थातिन के बचावल जा सकऽता आ अपना माटी के भाषा के गर्व के भाषा बनावल जा सकऽता। चलीं, भोजपुरिओ में नेवता लिखल जाव। 
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2. 

काल्हु हमार एगो मित्र पांडेय जी आइल रहीं। उहाँ का केंद्र सरकार के एगो जिम्मेवार कर्मचारी हईं, अत्यंत सज्जन पुरुष, संस्कार से भरपूर। मिलींले त अपना संस्कृति आ गाँव-घर पर खूब बात होखेला, खुल के। उहाँ के दू गो लइका केंद्रे सरकार में नोकरी में बाड़े सन आ उहनी के बियाह के बातचीत चल रहल बा। हम अपना ब्लॉग के चर्चा कइलीं आ उहाँके देखवलीं भी। उहाँ का बहुत उत्साहित भइलीं। हम अनुरोध कइलीं कि “तब नेवताऽऽ...” उहाँका हमार मन बूझि लिहलीं आ बिना थथमले बोललीं- “एकदम भोजपुरिए में। गाँव से बियाह होई त खाली भोजपुरी में आ कलकत्ता से होई त हिंदियो में।” हमार मन भीतर से खिल गइल। शुरुआत त नीमन भइल। रउँवा सभ तक ई समाचार जल्दिए पहुँचावल चाहत रहलीं हा। हमरा त बुझाता कि कहले के देरी बा , केहू ‘नाहीं’ ना करी। एह से आपन झूठमूठ के संकोच छोड़ल जाउ आ अपना हित-मीत, दर-देयाद सभ से एक बार निहोरा कऽके देखल जाउ। ज्यादा उमेदि बा सफलते मिली। 
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3. 

विजयदशमी कि विजयादशमी ? 
आजु विजयादशमी ह आ हमार प्रिय मित्र डॉ. विजय प्रकाश एह घरी अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ कर रहल बाड़े। मन भरल रहल हा बाकिर एगो पुरान डायरी पलटत खा उनकर कुछ एसएमएस मिलल बा। मन फेरु चुलबुल हो उठल। फेरु ऊहे मिजाज, ऊहे अंदाज। 02.10.2006 के ऊ लिखलन - 
विजय सत्य की हो असत्य पर 
संबंधों का रंग हो गहरा 
प्रेम पुलक से भरा समुज्ज्वल 
मंगलमय हो विमल दशहरा। 
हम अपना आदतबश भोजपुरी में लिखलीं- 
दारिद दशानन पर विजय दशहरा ह। 
गमगम उमंग भरल जीवन दशहरा ह। 
रच जाए बस जाए मन में दशहरा। 
सजके सँवर जाए तन में दशहरा। 
पन्ना पीछे पलटलीं त 23.9.2006 के कुछ अउर एसएमएस मिलल। मन फेरु चुलबुल हो उठल। फेरु ऊहे मिजाज, ऊहे अंदाज। 
विजय- तीन दिनों से बारिश बारिश 
मन अब ऊब चला है 
चलो चलें मन मित्रों के घर 
दस्तक देकर देखें। 
विमल- मन एतना उबियाइल बा 
अपना दुखबारी से 
कवनो सुख के बात लगेला 
मीत उधारी से। 
बारिस आई बारिस आई 
मन के काई कइसे जाई 
पाती तहरो पवलीं त 
लागल पहिला दिन फिर आई। 
साँचो दुर्गापूजा में हइसे बरखा होला ? चारू ओरि पानी-पानी आ काँच-कीच। तूफान के नाँव से सभकर साँस टङाइल बा- से अलग। मन लवटल। आजु विजयादशमी ह। बिल्कुल पोजीटिव थिंकिंग, हार के कवनो चर्चे ना। जइसे फगुआ में बैर आ नफरत भुलाके सभ राग रंग में डूबि जाला, ओसहीं आजु ‘हार’ शब्द के त मन में आवही ना देबे के चाहीं। 
आजु खाली जीत आ विजयी रहे के बात होखे 
हार भय संशय कहीं से आ न पावे पास मन के। 
आरे भाई, ई त कविता हो गइल। माने के परी अपना पूर्वज लो के। अतना सोचि-समझिके काम करत रहे लोग। आजु-काल्हु पच्छिम से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मातृ दिवस, पितृ दिवस, महिला दिवस आदि आदि मनावे के काम जोर-जोर से चल रहल बा बाकिर हमनी किहाँ त हजारन बरिस पहिले से तीज, जिउतिया के बरत धूमधाम आ सावधानी से मनावल जाला आ छठ के परब त अब डिठारे हो गइल बा। हमरा संस्कृति में हर काम खातिर बैनर के जरूरत नइखे बूझल गइल। 
कुछ दिन पहिले कोलकाता के एगो प्रसिद्ध अखबार के विशेषांक के मुखपृष्ठ पर बड़-बड़ टह-टह लाल अक्षरन में विजयदशमी पढलीं। मन अचकचाइल। बहुत दिन बाद कवनो बुद्धिजीवी कड़ा इस्टेप उठवले बा अपना पूर्वजन पर। आखिर गलत चीज के कब तक झेलत रही आदमी आ ऊहो मीडिया से जुड़ल आदमी। ताकत आ प्रभुत्व के खुशबू से गमगमात मन शांत कइसे बइठी ? एक मन कहलसि कि प्रूफ के गलती होई। दोसरका मन कहलसि कि देखत रहिह, एक दिन ‘एकादश’ का जगहा ‘एकदश’ लिखल पढ़ेके मिली। त हम का करीं ? मए गिनती आ पहाड़ा ठीक करे के हमरा के प्रभारी बनावल गइल बा ? अबकी पहिलका मन समुझवलसि- भाई परेशान भइला के जरूरत नइखे। हमनी किहाँ पाणिनी आ पतंजली गली-गली में भेंटा जइहें। ‘विश्वामित्र’ का जगहा ‘विश्वमित्र’ पढ़ेके कबो नइखे मिलल का ? 
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लेखक परिचय:-
जन्म: बड़कागाँव, सबल पट्टी, थाना- सिमरी
बक्सर-802118, बिहार
जनम दिन: 28 फरवरी, 1962
पिता: आचार्य पं. काशीनाथ मिश्र
संप्रति: केंद्र सरकार का एगो स्वायत्तशासी संस्थान में।
संपादन: संसृति
रचना: ‘कौन सा उपहार दूँ प्रिय’ अउरी ‘फगुआ के पहरा’
ई-मेल: rmishravimal@gmail.com

मैना: वर्ष - 7 अंक - 118-119 (अप्रैल - सितम्बर 2020)

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