संपादकीय: मैना: वर्ष - 7 अंक - 118-119 (अप्रैल - सितम्बर 2020)

सोशल मीडिया के दौर में भोजपुरी 

आठवीं सदी में नाथ संप्रदाय के संत चौरंगीनाथ से ले के आज इक्कीसवीं सदी ले भोजपुरी एगो भाखा के रुप में एक हजार साल से अधिका के समय तय कऽ चुकल बे। समय के एह लम्हर जतरा में भोजपुरी दुनिया के बाकी सगरी भाखा नियर हर तरह के समस्या अउरी संघर्ष के सफलता से सामना करत अपना के एगो जियतार लोकभाखा बना के रखले बिया। 

केवनो भाखा के अपना विकास के अनवरत प्रक्रिया में अपना के जियतार राखे खाती बहुत तरह के चुनउती के सामना करे के परेला। ओह चुनउतिन में सभसे बरियार चुनउती तब सोझा आवेला जब ऊ भाखा केवनो दोसरा भाखा के संपर्क में आवेले। एह संपर्क के प्रक्रिया में दुन्नू भाखा एक दोसरा पऽ आपन हर संभव असर छोड़ेले। दुन्नू भाखा एक दोसरा के आपन सबद, व्याकरन अउरी भाखा बेवहार के अदान प्रदान करेले। सबद, व्याकरन अउरी भाखा बेवहार के अदान प्रदान में भाखा के नया सबद, व्याकरन अउरी बेवहार सीखेले जेवन दुधारी तलवार नियर होला। जेवन भाखा एक आदान प्रदान के जैविक तरीका से अपनावत आगे बढ़ जाले, ऊ भाखा समय के साथे अउरी मजबूत होत जाले। 

केवनो भाखा के विकास एगो बहुत गतिशील अउरी परिवर्तनशील वातावरन में होला अउरी हर तरह के संभव कारक एह प्रक्रिया में प्रभावित करत आपन जोगदान देला। ओह कारकन में भाखा के बोलनिहार अउरी तकनीक के बहुत बड़ जोगदान होला। कागज के अविष्कार के बाद भाखा के विस्तार अउरी विकास के प्रक्रिया में अभूतपूर्व बदलाव आइल। प्रिंटिंग प्रेस के अविष्कार भाखा के विस्तार अउरी विकास के प्रक्रिया के लगभग बदल के रखि दिहलस। ओही तरे इंटरनेट अउरी सोशल मीडिया के अविष्कार भाखा के विस्तार अउरी विकास के सगरी प्रक्रिया के बदलि के रखि देले बा अउरी भोजपुरी ओसे अछूता नइखे। 

इहो बात दीगर होखे के चाहीं कि केवनो लोकभाखा के केवनो खास भौगिलक क्षेत्र के भीतर रेखांकित ना कइल जा सकेला। लोकभाषा हर तरह के सीमा के हमेशा उल्लंघन करे ले। भोजपुरी के सबदन के ले के केहू दावा ना कऽ सकेला कि ई सबद भोजपुरी के हऽ कि अवधी के, मगही के हऽ कि मैथिली के? एक लोकभाखा के सबद रिस के कब दोसरा लोक भाखा के सबद बनि जाई, कहल ना जा सकेला? आज भोजपुरी में संस्कृत, हिन्दी, उर्दू अउरी अंग्रेजी के सबदन के संगे अवधी, मैथिली, मगही अउरी अंगिका के क्षेत्र में बोले जाए वाला जाने केतने सबद परियोग आ रहल बा। हो सकले काल्ह कुछ नया भाखा के नया सबद भोजपुरी के हिस्सा बनि जाओ। 

भारत में लगभग हर पढ़ल-लिखल आदिमी दू चाहें दू से अधिक भाखा जानत बा। एह कारन हर आदिमी के बातचीत में दू भा दू से अधिक भाखा के सबदन के परियोग अनजाने में हो रहल बा। एह कारन हर भाखा में दोसरा भाखा के सबदन के स्वीकार्यता बढ़ रहल बा। भूमंडलीकरण के कारन भाखा, संस्कृति अउरी क्षेत्रीय/भौगोलिक सीमा के बन्धन पहिलहीं से ढील होत रहल हऽ अउरी इंटरनेट जइसन तकनीक अउरी सोशल मीडिया जइसन विकल्प एह गति के बढ़ा रहल बा। 

आज हर आदमी इंटरनेट अउरी सोशल मीडिया के माध्यम से आपन बात रख सकत बा। आदिमी के आपन बात कहे के सामर्थ्य में अभूतपूर्व बढ़न्ति भइल बा। एह कारन आज हर भाषा में हर संभव बदलाव हो रहल बा अउरी भोजपुरी एसे दूर नइखे। अपनी हजार साल से अधिका के इतिहास में भोजपुरी में आज सायेद सभसे बेसी लिखात बा। केवनो दावा करे से पहिले ई शोध के विषय बा। बाकिर ई बात बहुत साफ-साफ लउकत बा कि इंटरनेट अउरी सोशल मीडिया के कारन बाकी सगरी भाखा नियर भोजपुरी पहिले से बेसी समावेशी हो गइल बा अउरी ई समावेशी स्वभाव भोजपुरी खाती बढ़िया साबित होई, एकर पूरा विश्वास बा। 

आज बहुत सारा माध्यमन से चिन्ता जाहिर कइल जा रहल बा इंटरनेट अउरी सोशल मीडिया के कारन भोजपुरी दोसरा भाखा के सबदन के परियोग आ भाषाई अपसंस्कृति के बढ़ावा मिल रहल बा। बाकिर ई चिन्ता के विषय नइखे। 
राजीव उपाध्याय
मैना: वर्ष - 7 अंक - 118-119 (अप्रैल - सितम्बर 2020)

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