पाण्डेय कपिल के दू गो कविता

बूँद भर पानी

बूँद भर पानी के खातिर मन तरस के रह गइल
उमड़ के आइल घटा हालत प हँस के रह गइल॥

जब कि पथरा गइल कब से ई नजरिया हार के
आज उकठल काठ पर सावन बरस के रह गइल॥

हर जगह बालू के पसरल बा समुन्दर दूर तक
दूर से आइल ई पातर धार फँस के रह गइल॥

सोच में बीतत रहल बा जब कि जुग-जुग से समय
जिन्दगी फाँसी बनल गरदन में कस के रह गइल॥

लोग चारो ओर हमरा पर तरस खाइल बहुत
हाय, करइत साँप अइसन लाज डँस के रह गइल॥
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भोर हो गइल

खोल द दुआर, भोर हो गइल।

किरिन उतर आइल,
आ खिड़की के फाँक से धीरे से झाँक गइल,
जइसे कुछ आँक गइल,
भीतर से बन्द बा केंवाड़ी त
बाहर के साँकल के पुरवाई झुन से बजा गइल,
आँगन के हरसिंगार, दुउरा के महुआ जस,
चू-चू के माटी पर अलपना सजा गइल,
ललमुनियाँ चहक उठल,
बंसी के तान थोर हो गइल।।

रोज के उठवना जस, ऊठ, अब जाग त
किरिन-किरिन जूड़ा में खोंस ल,
झुनुक-झुनुक साँकल से पुरवाई बोलल जे,
पायल में पोस ल ;
अँचरा से महुआ के गंध झरल
हरसिंगार गंध साँस-साँस में भरल,
अँगना तूँ चहक ललमुनिया अस,
दुअरा हम बंसी बजाईं
कि मन मोर हो गइल।
खोल द दुआर, भोर हो गइल।।
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