लागे बरखी बुन्दनियाँ - दिनेश पाण्डेय

पियवा तनिका काम निवारऽ
लागे बरखी बुन्दनियाँ।

पछिमाही में कारा बान्हल,
मलके बिजुरी।
सघन गाछि पर धावत रहली,
अबगे चिखुरी।
मोरवा अबहीं बनल नचनियाँ
लागे बरखी बुन्दनियाँ।
साजन मन बिखाद अजवारऽ
काहे भइलऽ निरगुनियाँ।

पंछी भागे हदसल जइसन
पाँख सिकोरे।
हवा खिलंदड़ निरलज बौरी
देह झकोरे।
दुबकल बइठल ललमुनियाँ,
लागे बरखी बुन्दनियाँ।
बालम थोरिक साँस सम्हारऽ
माथे झलकल श्रम बुनियाँ।

आँगन में अलगनी पसारल
भींजी सारी।
छाजन पर के सुखत अदौरी
कवन उतारी?
तजि दऽ अनकर घुरबिनियाँ
लागे बरखी बुन्दनियाँ।
अगते आपन घर सहियारऽ
फिन सझुरइहऽ सभ दुनिया।

रस-झींसी से आँतर कोना
ले पम्हिआइल।
मुरझल जिनिगी-डाढ़ि सचेतन,
पनखी छाइल।
मन भरल गंध गुड़धनियाँ,
लागे बरखी बुन्दनियाँ।
सइयाँ धरती रूप निहारऽ
मेंटी हिय की चुनटनियाँ।
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लेखक परिचयः
नाम: दिनेश पाण्डेय
आवास संख्या - 100 /400,
रोड नं 2, राजवंशीनगर, पटना - 800023.
मो. न.: 7903923686

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