संपादकीय

रस ना बुझाइल - डॉ अशोक द्विवेदी

गते-गते दिनवाँ ओराइल हो रामा
रस ना बुझाइल।

अँतरा क कोइलर कुहुँकि न पावे
महुवा न आपन नेहिया लुटावे
अमवो टिकोरवा न आइल हो रामा
रस ना बुझाइल।

चिउँ -चिऊँ चिकरेले, गुदिया चिरइया
हाँफे बछरुआ त हँकरेले गइया
पनिया पताले लुकाइल हो रामा
रस ना बुझाइल।

रूसल मनवाँ के,झुठिया मनावन
सीतल रतियो में दहके बिछावन
सपना, शहर उधियाइल हो रामा
रस ना बुझाइल।

तनी अउरी पवला के,हिरिस न छूटल
भितरा से कवनो किरिनियो न फूटल
सँइचल थतियो लुटाइल हो रामा
रस ना बुझाइल।
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लेखक परिचय:-

नाम: डॉ अशोक द्विवेदी
संपादक: पाती
रचना: बनचरी, फुटल किरिन हजार, गाँव के भीतर गाँव आदि
सम्मान: राहुल सांस्कृत्यान पुरस्कार, भोजपुरी शिरोमणि आदि
बलिया, उत्तर प्रदेश

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