संपादकीय

कंकाल के रहस्य - 9 - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

पाड़ेजी ठलुआ के तरफ गइले त ठलुआ उनका से वही तरह से चिपक गइल जे तरह से ऊ सोहना से चिपकल रहे. पाड़ेजी ओकरा के कमली के फोटो दिहले आ समझा दिहले कि ओकरा के आगे का करे के बा. दुनो आदमी के चेहरा से लागत रहे कि अब मंजिल करीब बा. आपन काम करे के बाद पाड़ेजी अपना रास्ता चल गइले आ ठलुआ उनकर दिहल खाये कऽ सामान में खाये लागल कि सोहन के अपना तरफ आवत देखलस बाकि उनकर परवाह कइले बिना ऊ खाये में बिजी रहे. जब पँजरा अईला के बाद सोहन ओकरा के अपना आवे कऽ एहसास दियावे खातिर खखरलस त ठलुआ चौंक के उनका तरफ देखत बा.
'अरे बाबू साहब आप...अचानक..? माफ करे हमार ध्यान खाये में रहल.. का करी कब्बो कब्बो ही अईसन पकवान खाये के मिलेला...
'ई आदमी के रहल..?'
'रहलन आप जईसन ही एक बाबू साहब.. लड़कियन कऽ शौक हव.. पिछला हफ्ता ही एक लड़की से मिलवले रहली ओहि से फिर मिले चाहत बायन..ला.. आपो देखा ओकर फोटो....' कहत के ठलुआ उनका के कमली के फोटो पकड़ा दिहलस फोटो में कमली एकदम मार्डन नजर आवत रहे शायद कम्प्यूटर से स्पेशल कारीगरी कइल गइल रहे बाकि कमली के फोटो देख के सोहन के चेहरा के भाव बदले लागल.
'का भयल बाबू साहब.. फोऽटो पसन्द नाही आयल का..?' ठलुआ उनका चेहरा के पढ़े कऽ कोशिश करत उनका से सवाल कईलस..'
'नाही अईसन नाही हो सकत हव..?' सोहन बड़बड़वलस.
'का नाही हो सकत बाबू साहब.. फोटो में कुछ गड़बड़ हव का..? कहीं आप कऽ कवनोऽऽऽ रिश्तेदारऽऽऽ तऽ नाहीऽऽऽऽ.'
'ई लड़कीऽऽ ..?' सोहन फिर कुछ बड़बड़ाये के कोशिश करत के अचानक अपना चेहरा के भाव बदल के पूछलस...' काऽ हमके ई लड़की से मिलवा सकत हय..? '
'काहे नाही.. तनी महँग हव पर जब कहा तब... अबही आपन फोन दा बात करा दी.' ठलुआ के आत्मविश्वास देख के कहीं से ना लागत रहे कि ऊ झूठ बोल रहल बा. शायद ओकरा यही खूबी से पाड़ेजी ओकरा के अपना साथ रखले बाड़े.
'नाही ई नाही हो सकत हव....' सोहन फिर बड़बड़वलस आ ठलुआ के फोटो देके बड़बड़ात के ही वापस चल गइल. ओकरा चेहरा से लागत रहे कि ऊ घबराइल भी बा. ओकरा के जात देखत ठलुआ के चेहरा पर अपना काम के सफलता पर मन्द मुस्कान साफ नजर आवत रहे.
ठलुआ के कारनामा से अन्जान पाड़ेजी घरे पर चाय नाश्ता करे में बिजी रहले कि उनका के ठलुआ के यस. एम. यस. मिलल कि सोहन कमली के बारे में जरुर जानत बा. ई मैसेज देख के पाड़ेजी के चेहरा पर भी अपना काम में सफलता पावे पर मुस्कान तैर गइल. पाड़ेजी ठलुआ के मैसेज भेज दिहले कि मौका देख के उहँवा से निकल आव फिर ओकरा बाद फोन के नम्बर से खेले लगले आ फिर ओकरा के कानि से लगा लिहले.
'एस. पी. साहेब, हम गमछा बोलत बानी.. प्लान ए के सफलता पर बधाई स्वीकार करीं आ प्लान बी के शुरु करे के व्यवस्था कर दीं.'
'जी जरुर. मुबारक हो. हम अबही सब व्यवस्था कर देत हईं.' दुसरा तरफ से एस. पी. साहब के आवाज आइल.
'हाँ लेकिन ध्यान राखेब. कवनो जरुरी नईखे कि कातिल उहे हो जेकरा के हम लोग समझत बानी. से जबले हम हरी झंडी ना दीं हमरा अउरी आप के सिवा केहु भी प्लान बी के बारे मे न जान पाये आ मोबाइल कम्पनियो से कह दीं कि खाली हमरा के ही सब डिटेल दे अउरी केहु के ना... इंस्पेक्टर सिंह के भी ना...'
'जी जरुर आप बेफिक्र रहीं.... एक बार फिर से बधाई.' कह के दुसरा तरफ से फोन काट दिहल गइल.
पाड़ेजी मोबाइल रख के चाय के चुस्की लिहले त उनके नीक ना लागल आ ऊ आवाल लगवले...
'मलकाईन एक कप चाह अउरी देबु हो... ई ठंडा हो गइल बा.'
आवाज दिहला के तनिका देर बाद पंडिताईन दुसर चाय लेके अईली आ पहिले से मौजुद कप प्लेट के लेके अन्दर चल गइली. पाड़ेजी चाय पियत के कुछ सोचे लगले...
का रहे पाड़ेजी के प्लान बी..? का प्लान ए के तरह प्लान बी भी कामयाब होखी..?, का सचमुच सोहना ही कातिल बा...?, यदि पाड़ेजी के शक के आधार पर सोहना कातिल ना बा त फिर के बा..? एह तरह के हर सवाल के जवाब खातिर इंतजार करीं अगिला अंक के..
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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"












अंक - 94 (23 अगस्त 2016)

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