संपादकीय

पीड़ पराई - जनकदेव जनक

जब किस्मत खराब होई त कुछो हो सकत बा. बढ़िया आदमी भी सामने वाला के चोर चुहार नजर आवे लागी. ऊ आदमी गलतफहमी के झंझावत में अइसन फंस जाला कि जोर मारला के बादो निकल ना पावे. केहूं बचावे खातिर भी ना आवे. समय बीतला पर जब सांच बात सोझा होला तब तक आदमी के मान मरियादा मटियामेट हो जाला. ई बात रउरा सभे के साथे हम एह से साझा करत बानी कि हमहूं एक बार अइसनके फेरा में पड़ल रहीं. हम प्रिंट मीडिया से जुड़ाल एगो अखबार के फोटोग्राफर हई.
प्रेस के मीटिंग रांची में रहे. ओकरा के अडेंट करके अपना शहर लउटत रही . हम जवना सीट पर बइठल रही, ओकरा बगलवाला सीट पर एगो खूबसूरत नवजवना बइठल रही.बस में सीट से जादा लोग रहे. सीटन के बीच खाली बाचल जगह पर भी जातरी लोग खचाखच भरल रहे . बस कंडेक्टर जातरी लोगन के आगे पीछे ढकेलत टिकस जांच करत रहे. जेकर टिकस ना कटल रहे ओकर टिकसों काटत रहे. एही क्रम में ऊ हमार लगे पहुंचल आ टिकस देखाये के कहलस.
हम कहनी , ‘ हिंप पाकिट में टिकस बा, कइसे निकाली, देखत नइख कातना भीड़ बा. तू लोगीन पैसा कमाये के चक्कर में जातरीयन के जान मार देब. भेड़ बकरी नियर बस में ठूंसले जा रहल बाड़. बस में तिल रखे के भी जगह नइखे. ’ हमरा ओढ़हन पर ऊ तनिको सा धियान ना दिहलस. उलटे डांट के कहलस , ‘ टिकस निकालो और लोगों का भी टिकस चेक करना हैं.’ हम सीट से उठनी. बमुश्किल दायां हाथ घुमाके पीछे ले गइनी आ हिप पाकिट से पर्स निकलनी. पर्स में राखल तुड़ल मुड़ल टिकस सीधा करके ओकरा के देखइनी. कंडेक्टर टिकट थोड़का सा फाड़ के फेरू हमरा के लउटा दिहलस . टिकस रखे के दरम्मियान पर्स में राखल पासपोर्ट साइज के हमार एगो फोटो नीचे गिर पड़ल. ओकरा के उठावे खातिर निहुर के सीट के नीच झकनी. बाकिर संकीर्ण जगे होखे के कारन उठा ना सकनी. बगलवाली लइकी के कारन थोड़का सा दिक्कत आवत रहे. मन ना मानल. एक बार फेरू उठावे के कोरसिस कइनी . हमरा अंगुरी के स्पर्श पाके फोटो लइकिया के साड़ी के नीचे सरक गईल. जइसे कवनों बिलाई के बच्चा कवनों कुकुड़ के देख के कोना में दुबक जाला. जब फोटो साड़ी के नीचे चल गइल त हमरा पसीना छुटे लागल. सोचे लगनी फोटो कइसे उठाई !
ओह टाइम लइकी खिड़की से बाहर ताकत रहे. ओकर तन आ मन पीछे छुटते प्राकृतिक दृश्यन के अवलोकन में रमल रहे. खेतन में लहलहात हरिहर फसल के देख के ओकरा नयन में खुशी के चमक रहे. अचानक हम हड़बड़ा के ओकरा के छुवे के कोरसिस कइनी आ हमरा मुंह से निकल पड़ल, ‘ मैडम, थोड़का सा साड़ी ऊपर उठाई ना, नीचे से फोटो लेवे के बा.’ अतना सुनते ऊ आग बबूला हो गईल. तुरंत ओकर मासूम आंख लाल लाल हो गईल. नाक भौं चढ़ावत ऊ विद्युत गति से हमरा तरफ लपकल. हमार बड़-बड़ झु्ल्फी के जोर से अपना मुट्ठी में खींच के पीटे के शुरू कइलस. भद्दा भद्दा गारी देत हमारा गाल पर ताबातोड़ कई गो थप्पड़ जड़ दिहलस. ‘धीचोदा..कुत्ता के अवलाद..बेहाया..साड़ी के नीचे से फोटो लेबे..तोर छठी के दूध इयाद ना करा दिहनी त हमार नाम सपना ना...’ ऊ गारी देत रहे.
‘अरे...रे .रे. ई का करे लगनी, हमार मकसद ई ना रल. रउरा गलत समझ रहल बानी ..’ ओकरा के ठीक ढंग से हम समझा ना पवती तले बस में सवार एगो जाट बीच में टपक पड़ल, ‘मैडम, इसने आपको छेड़ा. आप इसे छोड़िए. इसे हम ठीक करेगा. ’ ऊ दांत पीसत अपना मजबूत पंजा में हमरा के ऊपर टांग लिहलस आउर गुरनात अपना बेलमूंड से हमरा नाक पर ठोक दिहलस. चोट के कारण हमरा दिने में तरेंगन लउके लागल. मन मछिया गइल. नाक से भल भल खून फेंके लागल. ओकरा बाद हमार जुल्फी पकड़ के बोलल, ‘ क्यों बे हीरो बनता है. तेरी सारी हेंकड़ी भूला दूंगा.’
ओकरा बाद मत पूछी ए भाई कि का भईल ? जातरीयन के हुजूम हमारा ऊपट माटा लेखा टूट पड़ल. लइकिया से सहानुभूति देखावत सब हमरा के पिटाई करे लगलनस. ओकनी खातिर हमार पीठ चमड़ा के ढोल बन गईल. हमरा बुझाइल आकाश में मंडरात गिद्धन के नजर कवनों मरल जानवर पर पड़ गईल होखे, जवन बड़ बड़ आपन डैना फइलइले जमीन पर उतर आइल होखस आउर अपना हिस्सा के मांस नोंचे खातिर आतुर होखस. ऊ जब तकले चोंच मारहेंनस, जबले शरीर कंकाल ना बन जाई. एह घटना पर बस में सवार मेहरारूअन में भी चरचा गरम रहे. सब लोग आपन आपन भड़ांस निकाले में बेयस्त रहे. कुछ पीड़िता सपना से अपनापन जतावे में लागल रही त कुछ ओकरा विरोधों में बोलत रही. एगो जानी अपटुडेट महिला बोलत रही,‘ पुरूष वक्त बेवक्त हमें अपना शिकार बनाते रहते हैं. दामिनी हत्या कांड में मिले आरोपियों को फांसी की सजा से सबक नहीं लिया. ये महिलाखोर बन गए हैं. इन्हें गोश्त खाने की लत पड़ गई है. सूखी हड्डियां भी चूसने से बाज नहीं आते. ’
तबही दुसरकी जानी बोलली, ‘ जब एह घटना में एक आदमी दोषी बा त सभके गारी देवल ठीक नइखे. सब लोग दुराचारी ना होला बहिन जी.’
एही बीच तिसरकी जानी पहलकी के समरथन में टपक पड़ली,‘ आपकी बातें सौ प्रतिशत सही है. लेकिन क्या घर की चहार दीवारी के अंदर बंद हमारी मेहर बेटियां सुरक्षित हैं ? सबसे ज्यादा यौन शोषण तो रिश्तों में ही होता है. लेकिन लोक लाज और मर्यादा हनन का हवाला देकर उसे घर में ही दबा दिया जाता है. राह चलती लड़की हो या सफर करती महिला यात्री, ऑफिस में काम करने वाली नवयौवना हो या घरेलू काम करने वाली दाई. पुरूष सभी को भोग की वस्तु समझता है. उसे मालूम है कि औरत के कई रूप होते हैं, बावजूद सबको प्रेयसी के रूप में ही देखता है. चाहे गोरी चमड़ी वाली हो या काली कलूटी, कोई फर्क नहीं पड़ता. मर्दो को स्त्री सौंदर्य से ज्यादा उसका सुडौल देह पसंद है.’
दुसरकी जानी फेरू टोकली, ‘ हम तोहरा लोगिन के बात से सहमत नइखीं. आज के फैशन परस्त लइकियन के तरफ तानी देखी ना. कइसन कइसन उत्तेजक कपड़ा पहिर के निकलत बाड़ीस, जवना में ओकनी के अंग अंग झलकत रहेला. देखला पर मरदे के छोडी मेहरारूअन के नजर शरम से झुक जाला .’
खिसियाके तिसरकी जानी दुसरकी पर हमला कइली, ‘ तुम देहाती महिलाएं सठिया गई हो. इसलिए अनाप शनाप बोल रही हो. ऐसे पौराणिक विचारों को किसी जादू घर में सहेज कर रखवा दो, तुम्हारी आनेवाली पीढ़ी के काम आएगी. ’
बस में जेतना मेहरारू ओतने बतकुचन होत रहे. अलग अलग सीट पर महिला पुरूषन के अंतरंग संबंध पर एगो विचार गोष्ठीये शुरू हो गइल रहे .
एगो कहाउत बा कि बनदूक से निकली गोली आ जुबान से फिसलल बोली कबहीं वापस ना आवे, ऊ सोझा खड़ा आदमी के सीना चीर के पार हो जाले. ओकर तड़प त मउवत से भी जादा असहनीय हो जाला. अगर केहूं से तमीज से बात कर लेहल जाव त ऊ खुशी खुशी बनारसी भा मगहिया पान खिला के ओठ लाल कर दिही. ओही जा जब जुबान फिसल गईल त लात -जूतन के बरसात के कमी ना होला .
बस में बढ़ते हंगामा देख के चालक के परान सूख गईल. ओकरा बुझाइल कि जादा बात बिगड़ी तो उग्र भीड़ बस में आगो लगा सकत बिया. आज के बदलल परिवेश में छेड़खानी कइल, सीटी बजावल, ताना मारल जुर्म हो गईल बा . अइसन मामला में जनता भी पहिले से जादा निरभिक आ जागरूक हो गईल बिया. अच्छा रही कि बस के कवनों थाना में लगा देवल जाव. ईहे सोचत ऊ पास के एगो थाना में बस के खड़ा कर दिहलस आ अपना सीट से नीचे कूद के दउरत थानेदार राम भरोसा के पास पहुंच गईल.
‘ अबे कुत्ते की माफिक काहे हाफ रहा है, कुछो कहना है तो जल्दीये बको.ना.’
‘साहेब ... बस में एगो लइकी के साथे कवनों छोकड़ा छेड़खानी ..’
‘छेड़खानी..’ दरोगा आपन आंख तरेरते चालक के खा जायेवाला नजर से घूरलस.
‘ हां..हां.हां ..साहेब...’ बोले में थोड़का सा चालक हकलाईल.
‘छेड़खानी में जरूर तेरा खलासी चाहे कंडक्टर होगा , आउर तुम स्याले भाग आये हो निरदोष बनने के लिए..हमको बुरबक समझता है’
‘ना...ना...ना...साहेब..हम...हाथ जोड़त बानी ...,रउरा गलत समझ गईनी..’ चालक हाथ जोड़ले गिड़गिड़ाईल.
‘जगन सिंह इस सिरफिरे ड्राइवर को हाजत में डालो.’ थानेदार अपना कांस्टेबल से बोलल आ हाथ में डंडा लहरावत बस की ओर निकल पड़ल. ओकरा पीछे पीछे दुगो सिपाही भी भगले.
थाना परिसर में बस के रूकते भीड़ हमरा के खींच के बाहर निकललस. पिटाई करत थानेदार के सौंप दिहलस. थानेदार भीड़ के हटावत हमार लमहर झुल्फी के पकड़लस आ चूतड़ पर एक लात जमावत दुनू सिपाहियन के तरफ ढकेल दिहलस. फेरू ऊ जोर से आवाज लगाईलस ,
‘ अरे भाई, दुखियारी लइकी कतही लउक नहीं रही है. कतही बदमाशों ने उसे मार तो नहीं डाला..?’
‘ लइकिया सुरक्षित बिया सर..ऊ अपना सीटे पर बइठ के रोअत बिया ...’ कई गो लोग एके साथे बोल उठल. ‘ आई सर ..,देखी.. ओकरा के बेचारी...’
बस के दरवाजा पर खड़ा भइल थानेदार के देखते लइकी हड़बड़ा के खड़ा भईल. अचानक ओकर बैग नीचे गिर गईल. ऊ अपना साड़ी के फुफती उठावत नीचे तकलस त हमार फोटो ओकरा लउकल. ओकरा भक से हंमार चेहरा इयाद आइल. ‘मैडम, थोड़का सा साड़ी ऊपर उठाई ना, नीचे से फोटो लेवे के बा.’ ऊ निहुर के फोटो उठा लिहलस. मारे भय के ओकर हाथ पांव फूले लागल. रूलाई हवा हो गइल . गुस्सा काफूर हो गइल. ऊ असमंजस के स्थिति में जस के तस खड़ा रह गईल.
थानेदार लइकी के हाथ से फोटो छीन लिहलस. फोटो के चेहरा पहचानते ऊ लइकिया के अजीब ढंग से घुरलस आ पूछलस,
‘ आरे रे...रे...ई फोटो केकर है?....बोलती काहे नहीं ..,हां,हां,हां आया समझ में....एक तरफ तो पिटावा रही हो आउर दुसरे तरफ ओकर फोटो निहार रही हो !..छी... छी..ई का माजरा है !’
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लेखक परिचय:-

नाम: जनकदेव जनक
पता: सब्जी बगान लिलोरी पथरा झरिया,
पो. झरिया, जिला-धनबाद
झारखंड (भारत) पिन 828111,
मो. 09431730244 
अंक - 88 (12  जुलाई 2016)

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