संपादकीय

फादर्स डे - रश्मि प्रियदर्शनी

" बाउजी, बाउजी....तनी ऊपर देखेम...उम्म्म्म्म... ना..लइटवा के अंजोरा तनी खड़ियाs जाईं..."
बाउजी धीरे धीरे खटिया से उठेके कोसिस कईनी..कई बरीस से निहुरल पीठ आ पुरान खटिया एक साथे चरमरा गइल। आपना कठुआईल रीढ़ के सीधा करे के कोसिस में बाउजी के देहिया तनाs गईल - "का भईल बबुआ...?"
" अरे, कुछु ना भईल..रऊआ ऊपर देखी... हां..एही तारे...आ हँसी तनी..."
दरद से बाउजी के पीठ तनतना गईल.. बेमार चेहरा पर हंसी ए तरे बुझाय लागल जईसे केहु मार के हसाव ता.. तबो, बाउजी कोसिस कईनी...हसे के..आ..सीधा खड़ा होखे के..बाकी जंखिआइल रीढ़ के हड्डी जवाब दे गइल...बाउजी फेरु निहूर गईनी..।।
अब तक बबुआ के धीरज जवाब दे गइल..झल्ला के कहलन-"एतनो नइखे होत?? एगो फ़ोटो खींचे के कहs तानी तs बुझाता खेत जोते के कह देनी..हमहू का ई गंवार आदमी के आगे बीन बजावs तानी। जानs तानी..काहे हम आजूए फ़ोटो खीचे खातिर एतना बेचैन बानी...फादर्स डे हs आज...रऊआ का बुझेम... फेसबुक पर डाले के रहल ह फ़ोटो.." कहत बबुआ बुदबुदात चल गईलन...
खटिया पर धम्म से बईठत बाउजी के अखिया में लोर चमके लागल..बबुआ के आपना ऊपर खिसियईला पर ना...बबुआ के सेल्फी ना ले पवला पर...
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लेखक परिचय:-

नाम: रश्मि प्रियदर्शनी
सदस्य - मैथिली भोजपुरी अकादमी,दिल्ली
पत्रकारिता/स्वतंत्र लेखन
सांस्कृतिक कूटनीति कऽ संस्था 'फ़ोरम फॉर कल्चरल डिप्लोमेसी' कऽ संचालन
अंक - 88 (12  जुलाई 2016)

1 टिप्पणी:

  1. का कइल जाव इ जमाना के। माई बाप से बढ़ के आजकल समाज में फोटू देखावे के चलन चलल बा। बहुत दुःख भइल इ सच्चाई पढ़ के।

    बहुते बढ़िया लेखन।

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