संपादकीय

खदेरन के पाठशाला (जनसँख्या) - लव कान्त सिंह

(सभ लड़िका बईठ के एक्के टिफिन में सेवई खात बारन स आ दनिसवा के ईद के बधाई देत बारन स, तब तक मास्टर साहेब के प्रवेश होता। सब हबड़-हबड़ अपना बेंच पर भागत बारन स)
सभ - मास्टर साहेब ईद मुबारख!
मास्टर साहेब - हँ! तुम सबको भी मुबारख। का भकोस रहे थे जी तुम सभ? ए लबेदा खारा होखो।
लबेदा - मास्साहेब लोहा छू के कहत बानी कि एमे हमार कवनो दोख नइखे। हई दनिसवा ईद के सेवई ले आइल रहल हऽ उहे खात रहनी हऽ सऽ।
मास्टर साहेब - ई तो बहुत बन्हिया बात है सभ को अइसही मिलजुल के रहना चाहिए। लाओ तऽ तनी हमहूँ चीखें, कईसन बना है।?
ढ़ोंढा - मास्साहेब हमनी चिखनी हँ सऽ बहुत बन्हिया बनल बा।
मास्टर साहेब - मारेंगे चार सटका। एतनो नहीं बुझता है कि हमको खाने का मन कर रहा है। साफ़ भाकोले है का जी?
दानिस - माहटर साहेब रउरा खातिर हम अलगा से एक टिफिन ले आइल बानी। लीं खाईं।
मास्टर साहेब- बाह, तुम है हमारा असली विद्यार्थी। बाकी सब त विद्या का अर्थी उठानेवाला है। बाह बहुते मीठ है। तुम्हारी अम्मी बनाई है?
खदेरन - ना मारसयेब जब रउवा जान जाएब त मीठ ना लागी काँहे कि सेवई एकर बाबूजी बनवले हऽ।

(सब लड़िका ठठा के हंसत बारन स)

मास्टर साहेब - हमको अइसा-ओइसा बुझे हो का? मार मुक्का के थूथुन भस्का देंगे। पढ़ाई-लिखाई में तेरे-बाइस आ चले हो अंग्रेजी बतियाने..बइठो!
लबेदा - ए मास्साहेब खदेरने के चलते रउवा सेवई भेंटाइल ह ना त हमनी सब खा गइल रहती सऽ। इहे कहलस हऽ कि मास्साहेब खातिर एगो अलग डिबा में रख दे।
मास्टर साहेब - नहीं तो का हम अपना जिनगी में सेवई नहीं खाये हैं? अइसन बेकूफ जइसन बात बोलता है? चलो किताब निकालो आज हम पढ़ के आये हैं जल्दी-जल्दी पढ़ा दें न त का जाने भुला जायेंगे।
दानिस - मास्साहेब आज तऽ हम किताब नइखी ले आइल।
मास्टर साहेब - काहे अपना खाला के बियाह में आये हो का?? आ तुम्हारा स्कूल का वर्दी कहाँ है? ई कुर्ता काँहे पेहेन के आये हो?
दानिस - काल्ह ईद रहे नू ओहिसे?
मास्टर साहेब - एक कटोरी सेवई खिया दिए तो बुझते हो की हम कुछ बोलेंगे नहीं! जाओ अपना बाबूजी को बोला के ले आओ।
दानिस - अब्बा त आजे सबेरे के गाड़ी से गईलें सूरत कमाए।
मास्टर साहेब - काल्हे ईद था आ आजे बाहर...काँहे जी?? ।
खदेरन- हम बताई मास्साहेब! एकर बड़का भईयावा से लड़ाई कऽ के खीस में गइल बारन।
मास्टर साहेब - बनोगे दाल-भात में मुसरचंद? तुमसे पूछे हैं की लबर-लबर बकने लगे? हं जी दानिस का ई सच बात है?
दानिस - जी मास्साहेब! अब्बा हमनी चौदहू भाई-बहिन के मुस्काबाद के बाजार पर ले जाके नाया-नाया जामा-पाइंट आ जुत्ता किन देले रहस। हमनी सभ जाना मेला गइनी बाकी बड़का भइया खिसियाइल रहे की ओकरा मोबाइल ना मिलल। ओहि खीस में ऊ मेला घुमे ना गइल। सांझ के अब्बा एक आदमी से कर्जा लेके मोबाइल किन ले अइले बाकी ओकरा टच वाला बड़का मोबाइल चाहीं जवना में फेसबुक चलेला। खीस में अब्बा ओकरा के लतिया देलन तऽ ऊ घर से भागल जात रहे। रास्ता में से अब्बा ओकरा के धऽ के ले अइलें। ओकरा बाद बड़की अम्मी, छोटकी अम्मी आ हमरा अम्मी में लड़ाई हो गइल। एही सभ कुकराह से अब्बा भोरहीं निकल गइलन हँ बाहर।
लबेदा - आ हउहो बतिया कह दे।
दानिस - मारेम सार लबेदा नू कि झबेदा बना देम।
मास्टर साहेब - का गारा-गारी करने लगे तुम लोग...देह में डर है कि नहीं?
ढ़ोंढा - मास्टर साहेब पूछी ना कि एकर स्भ अम्मी काहे खातिर आपसे में लड़त रहली ह लोग।
मास्टर साहेब - सभ अम्मी का का मतलब हुआ?
दानिस - जी हमार अब्बा तीनगो निकाह कइले बारन नू ओकरे के कहेला लोग सभ अम्मी।
मास्टर साहेब - त ऊ लोग आपस में काहे लिए लड़ रही थी?
दानिस - ई त हमरा नईखे पता।
लबेदा - ढ़ेर दिन प आइल रलन हँ एकर अब्बा।

(सब ठहाका मारत बा)

मास्टर साहेब - दांत चियारोगे बेसी, सबको एकजोरांह से लगेंगे हुड़वसने। आज-कल का बच्चा हो गया है कि बाबू का कमाते-कमाते दम छुट रहा है और लाट साहेब को मोबाइल आ लैपटॉप चाहिए। बाप के पईसा पर फुटानी करने में आगे हो गया है सब।
खदेरन - ऐ मारसायेब रउवो त अपना बाबूजी के पईसा पर फुटानी करत बानी।
मास्टर साहेब - एगो कौनो उदाहरण देके बताओ की हम कइसे फुटानी कर रहे हैं, नहीं तो आज तुम्हारे ऊपर खजूर का डांटा तूर देंगे?
खदेरन - रउवा सुध से पांच आदमी के नाम लिखे ना आवे बाकी बाबूजी के पईसा पर नोकरी खरीद के आज मौज काट रहल बानी, एकरा के बाप के पइसा पर फुटानी ना कहाई त का कहाई?
मास्टर साहेब - खदेरन! तुम्हारे चाचा बता रहे थे कि तुमको रसमलाई बहुत पसंद है चलो आज तरवारा का रसमलाई खिलाते हैं, भागो सब आज का छुट्टी।
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लव कान्त सिंंह
9643004592
 
 
 
 
 
 
 
 
 
अंक - 89 (19 जुलाई 2016)

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