विविध

गमछा पाड़े - 9 - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

हमेशा के तरह महादेव बाबू कमरा में बईठ के आपन रोजमर्रा के आदत पूरा करे के तैयारी करे लग ले, एह बात से अनजान कि बहरी खिड़की पर उनकर मौत के फरिश्ता आ चुकल बा आ उचित समय के इंतजार कर रहल बा. सही समय पर फरिश्ता के सोचल पूरा भइल आ कमरा में मोहन आ गइल. मोहन के हर हाल में एक लाख रुपिया चाहत रहे जेकरा चलते कुछ अइसन बातो भइल कि महादेव बाबू के सीना में दर्द उठ गइल. महादेव बाबू के एही हालत के फायदा उठा के मोहन उनका के धक्का देके बिस्तरा के नीचे से रुपया लेके चल गइल. (एतना कहला के बाद पाड़ेजी सबका के बारी बारी से देखे लगले. सब उनकरे के देखत रहे. ईहाँ तक कि राजनो)....का जवाँई बाबू, अबले के कहनी त हम ठीक कहत बानी नू?'
'जीऽऽऽऽ जी हँऽऽ..' पाड़ेजी के सवाल पर पहिले त राजन तनि घबरा गइल फेरु जवाब में सिर्फ हामी भर दिहलस...
'खैर, महादेव बाबू के दिल के दौरा पड़ल बा. एह बात क गुमान ना त मोहन बबुआ के रहे ना ही खिड़की के बहरी खाड़ फरिश्ता के जेकरा के ई इंतजार रहे कि कब महादव बाबू जहर के शराब पीके एह दुनिया से अलविदा करस आ कब ऊ कमरा मेँ आके ऊहाँ के हालात अईसन बना दे कि महादेव बाबू के मौत या त आत्महत्या लागे भा फेरु कतल क ईल्जाम मे मोहन बबुआ फँस जास. कमरा में बहुत देर शान्ति के बाद जब बहरी खाड़ फरिश्ता के लागल कि ओकर काम हो गइल बा त ऊ कमरा में आवे चहलस. एह बीच बहिना कमरा में आ चुकल रही आ अपना भाई के मोहन बबुआ के खिलाफ पुलिस में फोन करत देख उनकरा से फोन झटक के उनकरा के धक्का देके उनकरा मुँह पर तकिया रख के दबा चुकल रहि आ ई मान चुकल रही कि उनकर भाई अब नइखे बाचल. जबकि एह घटना से महादेव बाबू के सीना दर्द बढ़ के दिल का दौरा मे बदल चुकल रहे आ ऊ खाली निष्क्रिय भइल रहुवन, एकरा बाद बहिन कुछ अइसन इंतजामात करे चल गइल रही कि सबकरा महादेव बाबू के मौत आत्महत्या लागो. (एतना कहला के बाद पाड़ेजी बहिना के तरफ देखले त ऊ नजर चोरावे लगली). बहरी खाड़ फरिश्ता से एही जगहा चूक हो गईल. कारण का रहे हमरा ना मालूम लेकिन ओकरा से जवन चूक भइल ओकरा वजह से ओकरा मोहन बबुआ के कमरा में जाये क बाद आ ओकरा कमरा में आवे के पहिले का भइल एकरा बारे में ऊ कुछ ना जान पावल. वइसे एकरा पीछे इहो कारण हो सकेला कि ओकरा मालूम रहे कि शराब के बोतल मे मिलल जहर केतना देर में असर करी. जेकरा चलते ऊ कुछ देर खातिर खिड़की से अलगा चल गइल होखो.' एतना कहनी के बाद पाड़ेजी रुक गइले आ एक बेर फेर सबका के देखे लगले. पाड़ेजी के खामोशी से ममता के ना रह गइल...
'फिर का भयल गमछा चच्चा..?'
'जब ऊ कमरा मे आइल त बेसुध महादेव बाबू के मरल समुझ के उनकरा पंजरा जाके देखे लागल. उँहवा से जइसे पलटल महादेव बाबू ओकर हाथ पकड़ लेत बाड़े. हाथ छोड़ावे में जवन छीना झपटी भइल ओकरा कारण महादेव बाबू के हाथ के नाखून में जवन खून लागल ऊ ना त बहिना के खुन से मिलल ना ही मोहन बबुआ के खून से. एहि कारण रहे कि इ दुनो जाना के जुर्म कबूलला के बादो पुलिस इ लोग के इहँवा छोड़ गइल.
'फेर कातिल उहे काम कइलस जवन तनिका देर पहिला बहिना कर चुकल रहली. फर्क एतने रहे कि कातिल के जब तक महादेव बाबू के मरला के यकीन ना भइल ऊ उनकर गला दबवले रह गईल. आ ओकरा बाद जइसे जहर मिलल शराब के समेटे चहलस वइसे बहरा से बहिना के अन्दर अइला क अनेसा से ओकरा बहरी भागे पड़ल. बाकि ओकरा बहरा गइला क बाद बहिना आ मोहन बबुआ ऊहे काम करल लोग जवन ऊ करे चाहत रहे. जेकरा बाद केहू के महादेव बाबू के गला दबवला के संदेह ना हो. फेर एकरा बाद बहिना कमरा के दरवाजा से बहरी अइली आ मोहन बबुआ कमरा के खिड़की से बहरी गइले. एकरा बाद के कहनी के सबकरा मलूमे बा.'
एतना कहनी सुनला के बाद सब पाड़ेजी के साथे साथे एक दोसरो के देखे लागल. सबकरा चेहरा से लागत रहे कि सब कातिल के असली चेहरा देखे चाहत बा.
'लेकिन चच्चा फेर असली कातिल हव के?'
'बिटिया एह बार हम कउनो जल्दी ना करब. ना त फेर जवाँई बाबू के हमरा से शिकायत हो जाई. काऽऽ जवाँई बाबू, हम साँच कहत बानी नू?'
एह सवाल पर राजन के कुछ कहत ना बनल आ ओकरा तरफ से ममते कहलस...
'इनकर कहल सुनल माफ करा चच्चा आ अब जल्दी से असली कातिल के बारे में बता दऽ.'
एकरा पहिले कि पाड़ेजी कुछ कहते उनकर मोबाइल के घंटी बाजे लागल. पाड़े जी फोन पर बतियावे लगले.
'बोलीं. सिंह साहब हम गमछा पाड़े बोलत बानी. का कहत बानी ! कातिल के शिनाख्त हो गइल बा आ आप लोग गवाह के साथे महादेव बाबू के घरे आवत बान.. जीऽऽ, आईं हम एहजगे बानी. जी. जी. सब केहु बा. ठीक बा. केहु ना जा पाई.'
एतना कहला क बाद पाड़ेजी फोन काट दिहले आ सबकरा के बारी बारी से देखे लगले. सब उनही के देखत रहे.
'खुशखबरी बा. बस तनिके देर में पुलिस असली कातिल के पकड़ ली. ममता बिटिया?'
'जी गमछा चच्चा.'
'चाय के तलब होत बा. जब तक पुलिस गवाह के साथे ईहाँ आवे चाय पिया दऽ ना. बकिया कहनीओ पुलिस क सामने हो जाई. (फेर राजन से) जवाँई बाबू, सही कहत बानी नू?'
'जी बिल्कुल. (राजन पाड़ेजी के बात के जवाब देके ममता के से कहे लागल) ममता हम बाथरुम हो के आवत हई.'
एतना कहला क बाद राजन अन्दर कमरा में चल गइल आ ममता चाय बनावे खातिर रसोई क तरफ चल गइल. आ पाड़ेजी मोहन आ बुआजी के बईठे के इशारा करके अपनहूँ बईठ गइले.
तनिका देर बाद ममता चाय लेके आ गइल बाकि अबले ना त पुलिस आइल ना ही अन्दर के कमरा में से राजन.
'हम राजन के देख के आवत हईं' ममता चाय रखला क बाद अन्दर जाये लागल त पाड़ेजी के अगिला लाइन सुन के बकिया सब चौक गइल.
'कवनो फायदा ना होखी ममता बिटिया. जवाँई बाबू ना त एह समय बाथरुम में बाड़े ना ही घर में.'
'का कहत हउआ चच्चा? हमलोग क सामने ही त राजन कमरा मे गयल हऽ बाथरुम खातिर.' ममता आश्चर्य से सवाल कइलस बाकि बुआजी अउरी मोहन आश्चर्य से पाड़ेजी के देखत रहे लोग.
'ममता बिटिया तू भूला जात बाड़ू कि कमरा के खिड़की से आसानी से बहरी जाइल जा सकल जाला.'
'काऽऽऽऽऽ?.... एकर मतलब... कातिल... राजनऽऽऽऽ....?' ममता के चेहरा पर आश्चर्य के पराकाष्ठा हो गइल रहे. कुछ अइसने हाल बुआजी अउरी मोहनो के रहे. पाड़ेजी हाँ मे जवाब देबे मे देर ना कइले जेकरा बाद बुआजी बदहवासी से पाड़ेजी के पकड़ के चिल्लाये लगली.
'अरेऽऽ त फेर ओह कातिल के काहे ईहाँ से भागे दिहलऽ हऽ गमछा?'
'बहिना राजन एह घर से बहरी गइल बा, हमरा से दूर नईखे गइल. सिंह साहब ओकरा के लेके बहरी आ चुकल बाड़े आ सिर्फ हमरा संकेत के इंतजार कर रहल बाड़े.' एतना कहला के बाद पाड़ेजी सिंह साहब के आवाज दिहले त सिंह साहब चार गो सिपाहयन क साथे राजन के लेके अइले. एह समय राजन के हथकड़ी लागल रहे. ई घटनाक्रम में सबकरा से ज्यादा हैरान ममता रहे आ जब ममता राजन से कतल के कारण जाने चहलस त पाड़ेजी पूरा कहनी बतावे क जगहा सिर्फ एतने बतवले कि महादेव बाबू के राजन के बदचलनी के पता चल चुकल रहे आ ऊ राजन से मिल के ममता अऊरी ओकर रिश्ता तोड़ चुकल रहन. इहे बतावे खातिर महादेव बाबू ममता के कालेज से दू दिन खातिर घरे बोलवले रहन आ ई बात ममता के मालूम हो जात त राजन के बहुत बड़ नुकसान हो जात.
पाड़ेजी इहो खुलासा कइले कि उनकरा राजन पर शक ओहि दिना हो गइल रहे जब ऊ आपन कहनी में मोहन द्वारा महादेव बाबू के रुपया चोरावे के कहनी कहत रहन आ राजन के मुहँ से ई निकल गइल कि मोहन बाबूजी के कमरा से उनकरा रहते रुपया कइसे चोरा लिहलस? जबकि रुपया चोरावे के कहनी त पुलिस के बही खाता में भी ना रहे. पाड़ेजी इहो बतवले कि ठलुआ महादेव बाबू के खिड़की के बहरी मिलल पर्ची लेके लखनऊ में दुकानदार से कबूलनामा ले लिहले बा कि महादेव बाबू के जवन जहर देबे के कोशिश कइल गइल रहे ऊ केमिकल राजने खरीदले बा. सब कहनी कह के जब पाड़ेजी ममता से सहानुभूति देखा के बहरी जाये लगले. त सिंह साहब उनकरा के एगो बहुत पेचीदा केस के सुलझावे में मदद मँगले. पाड़ेजी ई कह के ऊहाँ से चल दिहले कि..
'ठीक बा, काल आयब.' 
 ---------------------------------------------------
 
अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
अंक - 85 (21 जून 2016)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

मैना: भोजपुरी साहित्य क उड़ान (Maina Bhojpuri Magazine) Designed by Templateism.com Copyright © 2014

मैना: भोजपुरी लोकसाहित्य Copyright © 2014. Bim के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.