विविध

कइसन निमित्त - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

अपना निमित्त 
हेरत 
सहूलियत 
सबही बा
सुध भुला के। 

एकला चले क विधान 
तूर रहल बा 
मरोड़ मरोड़ के 
नेह के डोरी 
सज्ञानों बा सभे। 

दरदियो सहत बा सभे 
रोज रोज 
तबों फंसल बा सभे 
अपना बनावल 
जाल में। 

स्वतन्त्रता जरूरी होला 
लेकिन अनुशासन में
अब नवका पीढ़ी 
रोजे धता बतावेले 
अनुशासन के।

फेनु दरद के सौगात 
मिलबे करी 
अपनापन भुलइबे करी 
फिर त केतनों हेरी
ना मिली। 

कह नईखे पावत 
चाहत बा कहल
उनकरे कइल 
स्वतन्त्रता के पहल 
उलटबासी बुझाता। 

हेरत रही फिर
केनियों अपनापन 
जवना के तुरे मे अगहरे रहा 
आपन लोग भा आपन माटी 
सपना हो गइल। 
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अंक - 69 (1 मार्च 2016)

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