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हमहु बोली बोलब - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

हमरा मालूम न नीमन, बाउर, 
भर दिन कलई खोलब। 
हमहु बोली बोलब॥ 

चीचरी परलका कागज लाइब। 
दुअरा बईठ के किरिया खाइब। 
मंच पर चढ़के दांत चियारब,
जीभर माइक तोड़ब। 
हमहु बोली बोलब॥ 

बिन गिनती हम पाला बदलब। 
हर दम साधब आपन मतलब। 
बुड्बकन के बांटब पाहुर, 
भर मन माहुर घोलब। 
हमहु बोली बोलब ॥ 

बिन बतकही के छेड़ब तान। 
भरब जेब हम सांझ विहान। 
भाषण अनसन आउर प्रदर्शन, 
भर दिन तखती ले डोलब। 
हमहु बोली बोलब॥ 

सोचब ना, दोष लगाइब। 
घोंट घांट के कसमों खाइब। 
पबलिक के बहकाइब निस दिन, 
खाली डलरे तोलब।
हमहु बोली बोलब॥

अजुए बोलाइब काल्ह भगाइब।
मंहइयों क सुतल भाग जगाइब। 
गुटका खाति परमिसन देइब, 
सभनी के जेब टटोलब।
हमहु बोली बोलब॥
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अंक - 60 (29 दिसम्बर 2015)

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