संपादकीय

ओरचन - केशव मोहन पाण्डेय

दुआरी पर 
किनारे देवाल से सटा के 
खड़ा कइल बा 
एगो खटिया,
ओकर हालत 
बड़ा डाँवाडोल बा 
ओकरा बिचवा में 
बड़ा झोल बा 
केहू के तरे सुतत होई 
बुझाते नइखे 
बाकिर 
ओरचन कसाइल बा 
ओरचन में 
दस गो गाँठ बा 
आ दोसरा ओर 
अइसन बिछवना बा 
जइसे राजा के ठाट बा। 

सबके माई-बाप 
इहे चाहेला 
कि आपन जामल 
दूध के कुल्ला करे 
अमृत के धार पिये 
भले माई-बाप 
जिनगी भर लुगरिये सीए। 

ओही दुआरी पर ना 
अनगिनत दुआरी पर 
खटिया खाड़ बा 
ओह संतानन खातिर 
माई-बाप के ढोवल 
पहाड़ बा। 

अनगिनत पूत 
सँचहू दूध के कुल्ला करत 
अमृत के धार पिअत बाड़े 
आ माई-बाप 
जिनगी के साँस गिनत 
आसरा के खटिया के 
नेह के ओरचन 
मर्यादा के गाँठ 
बान्ह-बान्ह कसता 
अभागी संतान 
सोचते नइखे 
कि ओकरा पर 
समय कितना हँसता। 
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अंक - 80 (17 मई 2016)

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