संपादकीय

नज़री में पानी - केशव मोहन पाण्डेय

चौकी पर 

बेलाइल पड़ल 
रोटी नियर 
नरम-चिकन 
गोल-मटोल 
अपना नन्हकी के देख के 
एक बेर 
भर गइल 
आँख माई के। 

जइसे 
भगौना के दभकत भात से 
टपके खातीर पानी 
काँपे लागेला 
पपनी जइसन ढकना 
माइयो के हियरा अधीर हो गइल, 
नन्हकी के भरत देह देख के 
अंतर ले 
बड़का पीर हो गइल। 

अब केहू कवना मोनीआ में लुकवावे 
रूप के एह गँठरी के 
कुछू त नइखे कहल जा सकत 
जमाना के नजरी के, 
जब नन्हकी स्कूल जाले 
बाजार करेले
देश के चिंता पर बात करेले 
अपना अचूक तर्क से 
अपने बड़का भइया के 
बेर-बेर मात करेले
त ओकरा तन-बदन के 
चोरवा आँख से टोहत 
ऊहे लोगवा कह पड़ेला 
'एकरा बाप-माई के त तनिको सावधानिये नइखे।'

अब माई कइसे बचाई नन्हकी के 
केहू के नज़री में पानिये नइखे।
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लेखक परिचय:-

2002 से एगो साहित्यिक संस्था ‘संवाद’ के संचालन। 
अनेक पत्र-पत्रिकन में तीन सौ से अधिका लेख, 
दर्जनो कहानी, आ अनेके कविता प्रकाशित। 
नाटक लेखन आ प्रस्तुति। 
भोजपुरी कहानी-संग्रह 'कठकरेज' प्रकाशित। 
आकाशवाणी गोरखपुर से कईगो कहानियन के प्रसारण, 
टेली फिल्म औलाद समेत भोजपुरी फिलिम ‘कब आई डोलिया कहार’ के लेखन 
अनेके अलबमन ला हिंदी, भोजपुरी गीत रचना. 
साल 2002 से दिल्ली में शिक्षण आ स्वतंत्र लेखन. 
संपर्क – 
तमकुही रोड, सेवरही, कुशीनगर, उ. प्र. 
kmpandey76@gmail.com

अंक - 12 (27 जनवरी 2015)

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