संपादकीय

घाव उभर गइल जादा - अभिषेक यादव

जिनगी के ह रंग सयाना
ई का भइल दादा हो,
अपने गोड़ गड़ासी पाजऽ
घाव उभर गइल जादा हो।

सूख गइल बा पोखरा गड़ही
सूख रहल बा कूवा,
फंस गइला ऐ बाबू तू
खेलत अइसन जूआ।


काट-छांट के रंग बिगड़ला
पेड़-पौधन आ माटी के,
चाल बढ़ावत पांसा फेकऽ
अब ऐकरा के पाटी के?

हरा-भरा ऐह दुनिया के
पात उजड़ गइल आधा हो,
अपने गोड़ गड़ासी पाजऽ
घाव उभर गइल जादा हो।

लू बहे बैसाखे से
माथे पीर बढ़ावेला,
नैना काजर सूख रहल अब
पुतरि नीर घटावेला।

सूरदास जी कइसे लिखिहें
ओ विरहिन बखान जी?
जेकरा लोर से नदी बहे तब
आज भइल श्मशान जी।

सावन-पतझड़ एक समाना
रंग हो गईल सादा हो,
अपने गोड़ गड़ासी पाजऽ
घाव उभर गइल जादा हो।

राह चलत नटई जरेला
केहू पियादे पानी राम,
छुवाछूत अब का भईल
काहे न देखेला चाम?

मनई-मनई के लजवाई
शर्म से पानी होखे द,
देंह चाट के त्रास बुझाई
पेट फाड़ के सोखे द।

कोस-कोस प सूखा बा
ठोप-ठोप के भादा हो,
अपने गोड़ गड़ासी पाजऽ
घाव उभर गइल जादा हो।

पानी के न पेड़ लगेला
न पेड़न से हानि जी,
माया गठरी कब ले रही
छोड़ीं पेड़ कटानी जी।

काज करा कूछ अइसन तू
केहू न होखे शानी हो,
पेड़-पौधन जस प्रेम बोई
छोड़ा अमिट निशानी हो।
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अभिषेक यादव











अंक - 79 (10 मई 2016)

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