संपादकीय

गमछा पाड़े - 5 - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

कमरा में सबकरा चेहरा पर अचरज के भाव रहे, सबकर चेहरा गमछा पाड़े क तरफ ताकत रहे कि उहे ई रहस्य पर से परदा हटावस. गमछो पाड़े बूझत रहन कि सब बन्द कमरा से बाहर निकले के रहस्य जल्दी से जल्दी जाने चाहत बा.
"त मोहन बबुआऽ,बन्द कमरा से बहरी जाये के राज रउआ खुद खोलऽब कि हमरे मेहनत करे के पड़ी?" पाड़ेजी के भारी आवाज से मोहन के चेहरा पर पसीना आवे लागल.
"राज....?, कइसन राज....? हम कुछ नाही जानत हईं."
मोहन के आवाज मे घरघराहट रहे आ चेहरा के घबराहट देख के अइसने लागत रहे कि महादेव बाबू के कातिल उहे बा.
"कउनो बात ना. पुलिस सब उगिलवा ली." कहत पाड़ेजी एगो खिड़की के पास पहुँच गईलीं "बाकि ओकरा पहिले रउआ लोगिन ई देख लीं कि बन्द कमरा से बाहर जाना कइसे सम्भव बा"
कहत के पाड़ेजी खिड़की खोल के चिटकनी के खास तरह से फँसा दिहले आ "बूझ लीं जा कि अब हम कमरा से बहरी जाके बाहर से ई खिड़की बन्द कर रहल बानी." कहत के खिड़की के झटका से बन्द कर दिहले. खिड़की पूरा बन्द होते ही चिटकनी झटका से अईसे बन्द हो गइल जइसे खिड़की अन्दर से बन्द कइल होखो. एतना कईला क बाद पाड़ेजी के भारी आवाज कमरा में गूँज गइल
"जवन काम हम कमरा के भीतरी से कईलीं हँ, उहे काम कातिल बहरी से कईले बा. (मोहन के तरफ देख के) का हो मोहन बबुआ हम साँच कहत बानी न?
"नाही! मामा के कतल मे हमार कउनो हाथ नाही हव. हम खाली रुपया चोरवले हईं." मोहन के जब कुछ ना सूझल त ऊ साँच उगिल दिहलस.
"मोहन भईयाऽऽ, ईऽऽ काऽ कहत हउआ? आखिर तोहके बाबूजी के कमरा से रुपया चोरावे के जरुरते का रहे? ऊहो एक लाख रुपिया?" मोहन के मुँह से रुपया चोरावे के साँच सुन के ममता के चेहरा पर आश्चर्य के कमी ना रहे.
"हम ई सब नाही बता पाईब, लेकिन हम सच कहत हई. मामा के कतल में हमार कउनो हाथ नाही हव."
मोहन खुद के संभालत तनि कड़ा हो के ई बात कहलस बाकि ममता अउर राजन से ना रह गईल.
"ई त बेहयाई के बात करत हउअऽ साले साहब! एक त चोरी, ऊपर से सीनाजोरी! चलऽ ईहे बता दऽ कि बाबूजी के जिन्दा रहते आ उनका कमरा में से बाबूजी के रहते तू रुपया चोरवलऽ कइसे? ममता हम त कहत हई मोहन के पुलिस के हवाले कर दिहल जाव. आगे क काम ऊ खुदे कर ली." एतना बात कहत के राजन के चेहरा पर मोहन का बदे खीसो के भाव रहे आ अब ममतो मोहन के नफरत के नजर से देखत रहे. बाकि ओकरा चेहरा से लागत रहे कि ऊ कुछ सोचतो बिया.
" का सोचे लगलू? तोहार हाथ फोन खातिर नाही उठत हव त हम खुदे पुलिस के बोलावत हई."
कहत के राजन अपना जेब से मोबाइल निकाल के पुलिस के फोन करे लागल त बुआजी राजन क हाथ से मोबाइल ले लेत बाड़ी आ कहत बाड़ी..
"नाही, पुलिस के मत बोलावा. भईया के कातिल मोहन नाही बल्कि हम हई." ई कहत के उनकरा चेहरा पर तनको लाज ना रहे,बाकि उनकर अपराध कबुलला पर सबकर चेहरा अउरी आश्चर्य से भर गइल.
"का....?" सबकर आवाज से कमरा गूँज गइल.
"ई का कहत हऊ बुआ? तू अईसन कईसे कर सकत हउ?" ई सवाल करत के ममता के चेहरा पर आश्चर्य अउरी नफरत दुनो भाव बरकरार रहे.
"हम सच कहत हई बिटिया. भईया के मौत के जिम्मेदार सिर्फ हम हई. लेकिन हमके खुद नाही मालूम कि ई सब कईसे हो गयल." कहत के बुआजी कुछ सोचे लगली आ साथे साथे कहे भी लगली मानो उनकरा सामने ओ दिन के घटना घूम रहल हो अउरी ऊ ओकर रनिंग केमेन्टरी सुना रहल बाड़ी.
"ओ दिन जब मोहन के भईया के कमरा में से बाहर आके घर के बाहर जाये के पहिले अपना हाथ के रुपया गिने लगल त हम समझ गइली कि कुछ गड़बड़ हो चुकल हव. हम ओसे कुछ पुछे चहली लेकिन ऊ हमके भी झटकार के चल गयल. हमसे ना रह गयल अउर हम भईया के कमरा में गईली त देखली कि भईया एक हाथ से आपन छाती पकड़ले रहलन अउर दुसर हाथ में मोबाइल पर पुलिस के फोन करत रहलन. ऊ पुलिस के कुछ कह नाही पावें ई सोच के हम ऊनकर मुहँ बन्द कर देली. तब हम ई ना समझ पइली कि उनके दिल कऽ दौरा पड़ल हव. अउर जब तक हमके कुछ समझ आवे खेला खतम हो गयल रहल." कहत के बुआजी अपने अँचरा में मुहँ छुपा के रोवे लगली. सब केहु के समझ में ना आवत रहे कि का कहल जाव, जबकि पाड़ेजी कुछ सोच में डूबल रहले. कमरा के खामोशी पाँड़ही जी से खतम भइल जब ऊ बुआजी से सवाल कइले...
"बहिना, ईहँवा तक के कहनी त ठीक बा बाकि ओकरा बाद का भईल? हमरा मतलब कि लाश खूँटी पर कइसे लटक गइल, अउरी तू कमरा से बहरी कइसे गइलू?" ई सवाल पर बुआजी खुद के सामान्य करत के कहे शुरु कइली..
"घर में केहु ना रहला से हमार काम आसान हो गयल. हम आराम से स्टोर में गइली अउर रस्सी लेके कमरा के हालात अईसन बना देली कि सबके ई सब आत्महत्या लगे. फेर खिड़की के रास्ते बहरी जा के वइसहीं खिड़की बन्द कर देली जइसे अबही सब देखलस." बुआजी के कहनी पर सबके आश्चर्य भी रहे अउर सबकरा चेहरा से लागत रहे कि सबके बुआजी के बात पर यकीन भी होखे, बाकि मोहन के ई कहनी पर भरोसा ना रहे.
"तू ई का कहत हउ अम्मा? भला तू ई सब कईसे कर सकत हउ?" मोहन अपनी अम्मा से सवाल कइलस, बाकि जवाब अम्मा ना बल्कि पाड़ेजी दिहले...
"वइसहीं जइसे तू महादेव बाबू के बिस्तरा के नीचे से रुपया चोरा लिहलऽ. का जवाँई बाबू, हम सही कहत बानी नू? पाड़ेजी मोहन के बात के जवाब देत देत राजन से सवालो कर लिहले.
"जी बिल्कुल."
"बाकिर हमार बहिना सरासर झूठ बोलत बाड़ी." पाड़ेजी नया खुलासा कइले त एक बार फिर सब आश्चर्य में पड़ गइल. सब केहु कबो पाड़ेजी के त कबो बुआजी के देखे लागल.
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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"












अंक - 81 (24 मई 2016)

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