संपादकीय

संपादकीय: अंक - 80 (17 मई 2016)

लसघरा के रोग: भोजपुरी में विमर्श

लसघरा के रोग बाड़ा खतरनक होला अउरी जे के ई लागि जाला ओके ई रगरि के रखि देला। भोजपुरियो साहित्य में लसघरा के रोग लाग गइल बा। जेङने स्त्री विमर्श अउरी साहित्य अंग्रेजी साहित्य से हिन्दी में आइल ओही तरे भोजपुरी में हिन्दी से दलित अउरी स्त्री विमर्श अउरी साहित्य ढूक आइल बा। लोग-बाग अउरी साहित्यकार आज काल्ह बस दलित साहित्य अउरी विमर्श बरात रहता जइसे कि ई सगरी बेमारी के दवाई हऽ। बाकिर कुछु लोग अउरी साहित्यकार एह दिसाईं कामो कर रहल बाड़न। आलोचना कऽ कुछ किताब अउरी लेख लिखाइलो बा। एह विमर्श के नाँव पर थोरी बहुत साहित्यो लिखाता जेवना कऽ बस एगही लछ बा दलित अउरी स्त्री कऽ बरतमान समाज में थान कऽ विवेचन। एक ओर से देखल जाओ तऽ बहुत बढ़िया काम हो रहल बा अउरी भोजपुरी साहित्य के बिकास खाती बढियो बा। बाकिर जे तरे ई दूनू विमर्श हिन्दी में आपन जगह बनवले बा अउरी जइसन साहित्य लिखाता ओही तरे जदि ई भोजपुरियो में लिखाए लागल तऽ भोजपुरी के कल्याने हो जाई।
देस के आजादी से ले के बीसवीं सदी के आखिर ले जेतना भोजपुरी कऽ आधुनिक साहित्य रचाइल बा जदि ओकर मूल्यांकन कइल जाओ तऽ ई साफ-साफ लउकत बा कि एक काल में दू तरह के भोजपुरी साहित्य रचाइल बा। एगो ऊ साहित्य बा जेवन निम्मन बा अउरी एकर भाव अउरी भाखा दूनू भोजपुरी के सुभाव अउरी संस्कार के बिकास क्रम में जोगदान कइले बा पर एकर मात्रा बहुत कम बा। दूसरका साहित्य ऊ बा जेवन जोरि-बटोरि के लिखल गइल बा अउरी एकर भाव अउरी भाखा दूनू भोजपुरी के सुभाव अउरी संस्कार के बिगारे के काम कइले बा बाकिर बरिआर बात ई बा कि सभसे बेसी अइसने साहित्य रचाइल बा एह काल में। 
एह दुसरका तरह के सहित्य में कहे खाती खुब परियोगो भइल बा अउरी ई परियोग अउरी कुछू ना हऽ बलुक हिन्दी के अड़भंगी नकल हऽ। एही परियोगन में तरह-तरह के विमर्श कऽ नाँव पर कुछ ना कुछ लिखाइल बा। लिखाइल बा तऽ कुछ बढियो लिखाइल बा। बाकिर एह साहित्य अउरी विमर्श के झगरा में हिन्दी के असर एतना बेसी बा कि सगरी तेबर हिन्दीए वाला ढ़ूक आइल बा। भाखा अउरी भाव कुछ अइसन बा कि पढला के बाद ई सोचे खाती अदिमी मजबूर हो जाई कि ई लिखात काँहे खाती बा। गड़हा भरे खाती कि एके अउरी गहीर करे खाती?
जब साहित्य केवनो भौतिक लछ के ले चले लागेला तऽ ऊ बस कुछ लोगन भा विचारन के महत्त्वकांक्षा के पावे के साधन बनि के रहि जाला। हिन्दी में इहे भइल आ भोजपुरियो में इहे भइल अउरी हो रहल बा। विचार अउरी अदिमी के गुलाम बना के भोजपुरी के भुलवा दिहल गइल बा। विमर्श के नाँव पर सगरी भोजपुरी साहित्य के भिखारी ठाकूर के कोठरी में बन कऽ के पूरा भोजपुरी के भिखारी बना दिहल गइल अउरी ई कइल भोजपुरी के भला करे के बतासा देखा के।
भोजपुरी के बढिया साहित्य के नाँव पर अइसहीं आटा गील बा ओमे ई विमर्श के लसघरा एके एतना बांट अउरी कमजोर कऽ दी कि एकर हाल हो जाई ‘अंगनी में मंगनी, बिलरिया माँगे आधे’ वाला। अइसन नइखे कि विमर्श ना होखे के चाहीं। जरूरी बा। बाकिर दिसा अइसन होखे जेवन सभके संगे ले के चल सके ना कि काटि छांटि फेड़ के ठूँठ बना देव। 
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अंक - 80 (17 मई 2016)

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