संपादकीय

विजय मिश्र बाबा जी दू गो छन्द

1

बड़ा हियरा में रहे अरमान अँजोरिया हो जाई।

कहियो आजादी हमरो गाँव के ओरिया आई॥

खेत खरिहान में तिरंगा फहरावे केहू त आई!
लाल किला के संदेशा हमनियो ख़ातिर पेठाई!!

बाकी अबहू सभे दिन एके लेख बा हो भाई!
ना जाने आजादी कब ले हमनि किहाँ आई!!

घुरफेंकन काका लड़ल रहन अँग्रेज से लड़ाई।
बाबूजी हामरो रहनी फौज के जांबाज़ सिपाही॥

आज़ाद बा सौंसे देश ई कवना मुँह से कहब ऐ भाई!
अखडेरे मुई जवान किसान ई कईसनआज़ादी ऐ भाई??
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2

फ़क़त एगो ख़ुशी का तलाश में भटक बाटे आदमी
अपने जमीनों जर से जुदा हो कसकत बाटे आदमी
का नईखे ऐह माटी में जोहे से पलटत बाटे आदमी
ज़िये के जद्दोजहद में अँगोरा अस धधकत बाटे आदमी
ख़ास अपनों से मिले खातिरा चेहरा बदलत बाटे आदमी
केने का अझुराईल बा खाता बही पलटत बाटे आदमी
छोड़ छाड़ि माटियो के काहाँवा जुदा होत बाटे आदमी
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लेखक परिचय:-

नाम: विजय मिश्रा 'बाबा' 
स्वतंत्र लेखक,पटना, बिहार 





अंक - 80 (17 मई 2016)

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