संपादकीय

गइल भँइसिया पानी में - सौरभ पाण्डेय

गइल भँइसिया पानी में, अब 
कइल-धइल सब बंटाधार! 

बान्हबि पगहा, रउए ढूँसी 
सुखहा मोन्हे मूड़ी ठूँसी
फेर घींच ले आईं, बान्हीं,
करीं फेरु से चारा-भूँसी!

मनमउजी ई भँइस बिया जे 
मुहँवाँ मारे.. आन्ह दुआर?

कहवाँ-कहवाँ ई धावेले
अपने लीलल पगुरावेले
कतनो कोंचीं, कतनो छान्हीं
अपने मन के सब गावेले

परल कपारे सपना देखल
भँइस बन्हाइल.. अबकी बार !

देखीं रउए आपन लीला
घर के आँटा कइनीं गीला
खूब पेन्हाइब पाछा, पहिले -
चोत बटोरीं, लागल टीला

कूल्हि कइल्का गोबर कइलस
आपन भँइसी हऽ सरकार !
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अंक - 80 (17 मई 2016)

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