संपादकीय

कोयलिया बोले - अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"

आयल मधुमास कोयलिया बोले . 

लाल लाल सेमरु पलास बन फूले 
सुमनो की क्यारी में भँवरा मन डोले, 
किसलय किशोरी डारन संङ झूले 
महुआ मगन हो गन्ध द्वार खोले. 
आयल मधुमास कोयलिया बोले . 

सुगन्धित पवन भइ चलल होले होले 
ढोलक मंजिरा से गूँजल घर टोले, 
रंग पिचकारी मिल करत किकोले 
छनि छनि भंग सब बनल बमभोले. 
आयल मधुमास कोयलिया बोले . 

उड्ल गुलाल लाल भर भर झोले 
मीत के एहसास बढल मन के हिडोले, 
धरती आकाश सगरे प्रेम रस घोले 
मख्खियन के झुण्ड पराग के टटोले. 
आयल मधुमास कोयलिया बोले . 
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अभय कृष्ण त्रिपाठी "विष्णु"











अंक - 75 (12 अप्रैल 2016)

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