संपादकीय

कइसे काढ़ी सगुनवा? - रजनीकांत राकेश

बितल जाता इहो लगनवा हो रामा
कइसे काढ़ी सगुनवा?

कबसे सेयान भइल बड़की लइकिया
हियरा में सालेला लोगवा के बतिया
खाहूँ के ना बाटे जब ठेकनवा हो रामा
कइसे काढ़ी सगुनवा?

अकढ़ कमाई कइ भरीला कइसो पेटवा
एको पाई बाँचे नाहीं पावे मोरा चेटवा
कहवाँ से देहब दहेजवा हो रामा
कइसे काढ़ी सगुनवा?

कतनो कमाईं घर के चले ना खरचवा
सुरसा लेखा बढल जाला रात-दिन करजवा
नाहीं लेबे देवे चैन सूदखोरवा हो रामा
कइसे काढ़ी सगुनवा?

सोचलीं कि असो कइसो करब बियहवा
बिन दहेज लिहले केहू सुने नाहीं बतवा
बुढ़वा संगे धिया कइसे वियाहब हो रामा
कइसे काढ़ी सगुनवा?
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रजनीकांत राकेश
अंक - 76 (19 अप्रैल 2016)

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