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सम्पादकीय: अंक - 76 (19 अप्रैल 2016)

चइता नाही बसे अब गाँव में


फगुआ के फाग चइता के सङे खतम होला। परम्परा ई बा कि आखिरी फगुआ गावला के बाद कम से कम एगो चइता गा के चइत मास के सुआगत कइल जाला। सुआगत कइला जाला काँहे कि महीनन के मेहनत के फल किसानन के मिले के महीना ह चइत। चइत आवत-आवत रबी के फसल पाक जाला अउरी कटिया के सङे शुरू हो जाला गीत गवनई के मौसम बनिहार (मेहरारू) जाहाँ कटिया करत में कटिया के गीत गावे लें अउरी मरद खरिहान्ह में चइता तऽ घरे मेहरारू चइती।
खेती बारी के एह देस में गीव-गवनई के जाने केतने विधान के जनम खेत-खरिहान्ह में भइल बा। जाहाँ पहिले परम्परा रहल सभकर गाला एके सङे खरिहान्ह में रखाए अउरी एके सङे बैले से दंवरी होखे तऽ गाला के रखवाली अउरी दंवरी करे खाती लोग रात-रात भर जागे। दिन भर कटिया अउरी रात भर दंवरी भा रखवाली कइल काहां आसान बा तऽ लोग सहारा लिहलें गीत-संगीत के अउरी एह तरे चइता विधा के जनम भइल जेवना में जोश अउरी संगठन के भाव लउकहीं के रहे। बाकिर समय के सङे के अउरीओ भाव जुड़त चलि गइल; बिरह, बेदना, प्रार्थना अउरी जाने का-का। जेवना बेरा घर के मरद खरिहान्ह में राति बितावस ओही बेरा महरारू घर पऽ अकेले बिरह बेदना भाव से गुजरत चइती विधा के जनम दिहलीं जेवन में परेम, बिरह, बेदना अउरी ठिठोली के सङे-सङे प्रार्थना के भाव निकसि के बाहर आइल।
समय के सङे चइता अउरी चइती गावे के रंग-ढंग में बदलाव आइल। जेवन चइता अउरी चइती पहिले खरिहान्ह अउरी घर में रहल ऊ ओह देवार से बाहर निकसि के शास्त्रीय संगीत के हिस्सा बने लागल अउरी बदलत खेती-बारी के रंग-ढंग चइता अउरी चइती के खरिहान्ह अउर घर से बहरिया दिहलस अउरी धीरे-धीरे ई महफिल में समा गइल।
आज हाल ई बा कि चइता अउरी चइती शास्त्रीय स्कूलन में सिखल-सिखावल जा रहल बा बाकिर अपनी जनम थान ई मर रहल बा। लोग भूला गइल बा कि चइता अउरी चइती उनकी पुरखन के विरासत है जेवना के हजारन साल में खड़ा कइल गइल ऊ एह विकास के भोकाल में उधिया रहल बा।
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अंक - 76 (19 अप्रैल 2016)

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