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भोजपुरिया समाज में चइत महिना - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

हिन्दू कैलेंडर कऽ पहिलका महिना के चैत्र भा चइत नाम से जानल जाला। ई महीना बसंत रितु के बिदाई के दुआरी खोलेला। विक्रम संबत के चइत के अंजोरिया पख के पहिलकी तीथि से दुर्गा बरत पूजन शुरू होखेला। एही तीथि के राजा रामचन्द्र के जनम, युधिष्ठिर के राजतिलक आउर सिख परंपरा के दुसरका धरम गुरु अंगददेव के जनम भइल रहे। चित्रा नक्षत्र के कारण से भी ए महिना के चैत्र कहल जाला। चइत महिना के पौराणिक महातम भी बाटे। बर्ष प्रतिपदा के सृष्टि रचना कऽ शुरुवात भी मानल जाला। 

भोजपुरिया समाज में चइत महिना के अलगे महातम बा। फसल कटला के बाद किसान लोग भी खाली होखेला, एही से इहवाँ एह घरी गीत गवनई के धूम रहेला। चइता आउर चैत्र क लोकराग, फागुन आउर राग-रंग के उत्सव होली के बाद एगो खालीपन आउर उदासी से जनम लेवेला। अपनन से बिलग होवे कऽ कसक तऽ होबे करेला, ओमें कुछ विरह के रंग भी घुलिए जाला। खेतन के फसल कटाई के बाद थाकल मादल मनो के थोड़ा बहुत अराम देवेला ई चइता राग। भोजपुरी लोक में चइत राग/चइता गायन बहुत लोकप्रिय बाटे। थाकल मन चइता से कुछ तुष्टि पावेला। भोजपुरी के ए राग के कवनों जवाब नइखे। 
कवि लोगन के लेखनी भी चइत में खुबे चलेल बे। आजुवो ले डा० अशोक द्विवेदी इ क़हत ना अघालें :
'टह टह टहके अंजोरिया
चइतवा बड़ा नीक लागे॥'
चइता के गीतन में कतों-कतों भावना के अइसन चित्रण भइल बाटे, जवन मन के छू लेवेला,
‘एही ठइयां झूलनी हेराइल हो रामा एही ठइयां
घरवा में खोजली, दुअरा पे खोजली
खोजी अइली संइया के सेजरिया हो रामा, खोजी अइली।’
चइत महिना में बिरहिन के विरह भी छलके लगेला। तब इ कहे के परेला:
‘चढ़ी गइलें चइत खुमार हो रामा
पिया नाही घरवाँ।
केकरा से उचरीं हम मनवा क पीरिया
पिया के पिरितिया में पागल तिरिया
नन्हके बा देवरो हमार हो रामा।
पिया नहीं घरवाँ।’
नवकी पीढ़ीयो आपन सुघ्घर परंपरा के संगे जीए। एही बात के कहत अशोक द्विवेदी जी के राग सुन सकब:
‘मन मधुवाइलग, तन अलसाइल
नव सिरजन के, रंग रँगाइल
नीक ना लागे कोठरिया 
चइतवा बड़ निक लागे!’
इ चइती गीते में हो सकेला कि भगवान शंकर आउर पार्वती जी संवाद करत होखे भा कहीं शिवजी के तांडव नृत्य का वर्णन होखे :
‘भोला बाबा हे डमरू बजावे रामा कि भोला बाबा हे,
भूत-पिशाच संग सभ खेले तांडव नाच दिखावे हे रामा।’
कबों कबों नायिका फूल में आपन चुनरी रंगवावे खाति अपने पति से निहोरा भी करत दीखेले:
‘सैंया मोरा रे कुसुमी बोअईहऽ हो रामा,
चंपा लगइह, चमेंली लगइह, 
खेतवनि कुसुम होअइह हो रामा।’
साँच काहल जाव त इ चइती गीत के एही मधुरता में लोक मानस कूल्हे रूप वर्णित भइल बाटे जिनगी के सिंगार के, वियोग के, खुसी के, भक्ति आउर आस्था के। एह लोकराग आउर भोजपुरिया परंपरा पर त केहु मोहाय जाला, त हम कइसे बाचब :
‘अमवा के मोजरी से कोइलरी के बोलिया
आवत चइतवा में ताना देहलस छलिया
कइसे सम्हारी नजरिया हो रामा
गोरिया मातल रहे।’
भोजपुरियन के लोकराग आउर परंपरा के संगे एगो रसगर जिनगी के उछाह होला, ओह खाति सिरजना के सँजोये के, आगे बढावे के, दूषित होखे से आउर बिलाए से बचावे के जरूरत बा।
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लेखक परिचय:-


मैनेजिग एडिटर (वेव) भोजपुरी पंचायत
बेवसाय: इंजीनियरिंग स्नातक कम्पुटर व्यापार मे सेवा
संपर्क सूत्र: 
सी-39 ,सेक्टर – 3 
चिरंजीव विहार, गाजियावाद (उ. प्र.) 
फोन : 9999614657
अंक - 76 (19 अप्रैल 2016)

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