संपादकीय

चइता चित्त से जोड़ेला - केशव मोहन पाण्डेय

चइता परेम के पराकाष्ठा के प्रस्तुति ह। परेम में मिलन, बिछुड़न, टीस, खीस के प्रस्तुति ह। जिनगी के अनोखा पल के अनोखा भावन के अभिव्यक्ति के प्रस्तुति ह। बिहार आ उत्तर प्रदेश में चइत महीना में गावे वाला गीतन के चइता, चइती चाहे चइतावर कहल जाला। चइता में मुख्य रूप से चइत माह के वर्णन त रहबे करेला, ई श्रृंगार रस में वियोग के अधिकता वाला लोकगीत हवे। गायिकी में चइता के 'दीपचंदी' चाहें 'रागताल' में गावल जाला। कई जने एहके 'सितारवानी' चाहें 'जलद त्रिताल' में गावेले। भले आधुनिकता के डिजिटल लाइट में चइता के चमक मद्धिम हो गइल बा, बाकिर आजुओ भोजपुर, औरंगाबाद, बक्सर, रोहतास, गया, छपरा, सिवान, देवरिया, कुशीनगर, गोरखपुर से चलत जहवाँ भोजपुरी के सचका सपूत बाड़े, चइता के लहर उठबे करेला। लोग एह लहर के लहार में महफिल जमाइए लेला। सचहूँ, चइता चित्त से जोड़ेला। 
जइसन कि सभे जानते बा, भारत में चइत के बरिस के पहिलका महिना कहल जाला। बरिस के पहिलका महिना भाइला के नाते एकर बहुते महातम बा बाकिर गीतनों के कारने एकर महत्ता बढ़ जाला। फागुन के लहरदार गीतन के बाद चइत के उमसत मौसम में बिरह के वण्र्य-विषय पर आधारित भोजपुरिया लोक-मानस में चइता के धून से मन कहीं अउरी उजझ जाला। मौसम में झनक बढ़े लागेला आ खेतन में रबी फसलो पाक के झाझर नियर बाजे लागेला। एह बेरा किसान लोग खेतन के सथवे खरिहानन में ढेर लउके ला लोग। एह कूल्ह अवसरन पर चइता के टेर से मन फेर होखे लागेगा। 
अगर ध्यान से देखल जाव त सोंझे बुझा जाला कि ऋतु पर आधारित गीतन में जन-मानस पूरी तरह से तरंगित आ उन्मादित दिखाई देता। फगुआ के बाद चइता एकर एगो अदभुत नमूना ह। कजरी आदि त बड़ले बा। चइत के महिना में गावे के कारने एहके चइता कहल जाला। अपना भोजपुरिया क्षेत्र में एके कई जगहे ‘घाँटो’ कहल जाला। ई मगही में ‘चइतार’ आ मैथिली में ‘चइतावर’ के नाम से जानल जाला। चइता के बारे में कहल जाव कि एहमे सभसे अधिका मीठास, रस आ कोमलता रहेला, त कतहूँ से तनीको झूठ ना होई। चइता के एगो गीत में प्रकृति के साथ के उदाहरण देखीं -
'मोती के मउनी जइसन तीसी पाके,
सोनवा जइसन मटर छिमी से झाँके,
गेहुँवा पर चढ़ल ललइया, हो रामा,
मोरा अँगनइया।
फुदुक चहके ले गौरैया, हो रामा,
मोरा अँगनइया।'
चइत माह के बदलाव के ऋतु के रूप में जानल जाला। पेड़न से पुरान पतई गिर गइल रहेला आ नवागत से पेड़न पर रौनक रहेला। प्रकृति में चारू ओर नयापन से नया उल्लास लउके ला। एही महीना में राम जी के जन्मोत्सव मनावल जाला, से चइता में ओकर वर्णन त होखबे करेला, राधा-कृष्ण के बिरह के वर्णन भी होला। हमरा बुझाला कि राम नवमी चइते में अइला के कारने एकर प्रभाव चइता में भी लउकेला। एह गीत के पहिलका पंक्ति के सथवे हर स्थाई पंक्ति में ‘हो रामा’ के अलाप कुछ अइसने लागेला। कहल जाला कि चइता में छंद के ना, लय के कमाल होला। गायक लोग के मानल जाव त ई पढ़े से अधिका सुने के गीत ह। एह के गायिकी के कलाकारी त ई ह कि एहमें ढोलक के थाप आ झाल के झंकार पर हुकार होत रहे के चाही। एकर असर आदमीए-जन ना, चिरई-चुरूंगो पर पड़ेला। चइता सुनते मन के घूटन परा जाला। चइता लोक मन के गीत होखला के सथवे शास्त्रीय संगीत के विधा ह। चइता के सामूहिक गायिकी के विलंक्ष्ण दृश्य होला। जब ई झलकूटिया रूप में गावल जाला त गायक लोग के सामान्यतः दू दल हो जाला। पहिलका दल एक-एक पंक्तियन के गावेला त दूसरका दल ओकरा स्थाई टेक के बेर-बेर दोहरा के स्वर के ऊँच करत रहेला। 
'रामजी जे लिहनी जनमवा हो रामा
चइत महिनवा।'
डॉ कृष्णदेव उपाध्याय जी अपना ‘लोक साहित्य की भूमिका’ में कहले बानी कि चइता के दू गो प्रकार होला - झलकुटिया आ साधारन। झलकुटिया माने जब गावे वाला लोग झाल कूट कूट के, बजा-बजा के गावे लें। एह चइता से सुर के मधुरता, मादकता के सथवे जोशो सामने आवेला। अब साधारन चइता ऊ ह, जवना के केहू विशेष आदमी गावेले। चइता में मिलन होला, विरह होला। ईंहा आनन्दो बा त पीड़ा के सथवे तड़पो बा। ईंहवा रामजी के जनम के उठाह बा त महावीर के अवतारो के कहानी बा। प्रकृति के सुन्दरता बा त प्रकृति के उमसत रूप के दरदो बा। चइता परेम के गीत ह। एहमें संभोग शृंगार के कहानी राग-सुर में कहल जाला। एकरा वर्णनन के विषयो विविध बा। कही सुरूजदेव के उगलो के बाद चादर तनले आलसी पतिदेव के जगवला के कथा रहेला त कहीं दाम्पत्य जीवन के राग-रंग आ नेह-कलह के कहानी रहेला। कही पदरेसी पति के ना अइला के दरद रहेला, -
'पीपर पात झरि गइले हो रामा
पिया नाही अइले।'
आधुनिक विद्वान लोग चइता के दू गो रूप बतावेला - चइता आ चइती। एह आधार पर चइती स्थाई आ ठहराव से गावल जाला जवना में गावत घरी टाँसी के प्रयोग ना कइल जाला, चइता में कइल जाला। चइता के पुरुष प्रधनता में गावल बतावल जाला त चइती के स्त्री प्रधनता के। मूल रूप से दूनो के गायिकी कला में अंतर होला। गावे के केहू गावे बाकिर जेकर जवन भाव रही ओही लगले नामकरण होला। इहो कहल जाला कि चइता एक छंद के होला आ ओमे एक पंक्ति प्रमुख होला बाकीर चइती तीन आ चार छंद के होला आ ओमे सभ पंक्ति प्रमुख होला। वइसे शास्त्रीयता पर एकर विभक्ति प्रमाणिक नइखे। ऊँहा खाली ‘चइता’ बा। एगो वर्णन देखीं -
'झीनी चुनरिया में लउके गोल नैना
रातरानी तहे-तह सजावेली रैना,
छछने मन-पनछुइया नैया, हो रामा,
मोरा अँगनइया।'
समग्रता में देखल जाव त चइता में कहीं ननद-भउजाई के कवनो पनघट पर केहू के छेड़खानी कइला के वर्णन रहेला त कहीं ग्वालीनन के मटका फोड़त कृष्ण के वर्णन। कई बेर चइता में वसंत के सौंदर्य आ फागुन के मस्ती के वर्णनो मिलेला। प्रकृति के वर्णन के सथवे कई बेर संभोग शृंगार के सरस वर्णन लउके ला। टिकोरा आ कचनार के वर्णन एकर सुन्दर उदाहरण बा। वर्णन त सगरो मिलेला बाकीर भाव के परदा लागल रहेला। देखीं ना 
'अइहें पियवा त धरेब भर अँकवारी,
कोइलासिए ना रही बारी के बारी,
सोचि के मदन मन धधइले हो रामा,
पिया नाहीं अइले।'
चइत माने मधुमास के दिन। एह समय में अपना गाँवन-देहातन में फसिलन के पकला के, फसिलन के कटला के आ खरिहाने पहुँचला के चर्चा रहेला। अपना गाँवन में एह मधुमास के दिन में चइता गावे के पुरनका परंपरा भले आज बदल गइल बा, बाकिर आजुओ कुछ लोग बा जे हमरा टोला के फुलगेना संत के परंपरा के अदालत भाई के बहाने आगे बढ़ा रहल बा। आजुओ चइता गावे के पुरनका परंपरा जीअत बा। 
बात त साँचे ह कि जब चइता के लय में ढोलक आ झाल के संगत मिलेला त सुने वाला के मन झनझना उठेला। समय के बवंडर में उधियात आज रोटी-रोजगार जोहत लोक-परंपरा देश के सीमा से निकल के विदेशो में पहुँच रहल बा बाकिर चिंतिंत रूप में। चिंता अपना परंपरा के मेटला के। चिंता रोटी के बहाना के। चिंता नाम के दौर में काम के डुबला के। 
चिंता के त चिता कहले जाला। जब अपना परंपरा, अपना संस्कृति, अपना लोक-जीवन पर ग्रहण लागे लागी त मन के सगरो मीठास माहुर नियर हो जाई। हम सभके अपना मान-मरजाद के सथवे अपना लोक-रीति, लोक-परंपरा के बचवला के, सहेजला के, सँवरला के उद्यम करत रहे के चाहीं। अपना कूवत भर अपना लोक-गायकन के संरक्षण करत रहे के चाही आ समय-समय पर लोक-उत्सवन के गवाह बन के, असरा आ सहारा दे के, कान में अँगुरी डाल के गावत रहे के चाही -
'कोसिला घरे अइले रघुराई, हो रामा,
बाजे बधाई।
धनि दशरथ धा के दरसन चाहें,
अन्तर-नयनन से परसन चाहें,
बलि जाले देखि मुसकाई, हो रामा,
बाजे बधाई।'
लोकगीत चइता के चइतन्यता के आधारो पर ई निखटके कहला जा सकता कि आपन लोक-संस्कृति अति समृद्ध ह। समृद्धि के आँके-मापे खातिर ही सही, जब कबो, कवनो कारण से एक बेर मुड़के अपने लोक-जीवन के देखीं, त सहजे बुझा जाई कि भोजपुरी के लोक जीवन के जइसन लोक-साहित्य, लोक परम्परो केतना समृद्ध ह।
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लेखक परिचय:-

2002 से एगो साहित्यिक संस्था ‘संवाद’ के संचालन। 
अनेक पत्र-पत्रिकन में तीन सौ से अधिका लेख 
दर्जनो कहानी, आ अनेके कविता प्रकाशित। 
नाटक लेखन आ प्रस्तुति। 
भोजपुरी कहानी-संग्रह 'कठकरेज' प्रकाशित। 
आकाशवाणी गोरखपुर से कईगो कहानियन के प्रसारण 
टेली फिल्म औलाद समेत भोजपुरी फिलिम ‘कब आई डोलिया कहार’ के लेखन 
अनेके अलबमन ला हिंदी, भोजपुरी गीत रचना. 
साल 2002 से दिल्ली में शिक्षण आ स्वतंत्र लेखन. 
संपर्क – 
पता- तमकुही रोड, सेवरही, कुशीनगर, उ. प्र. 
kmpandey76@gmail.com
अंक - 76 (19 अप्रैल 2016)

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