संपादकीय

विद्रोह - प्रसिद्ध नारायण सिंह


जब सन्ताबनि के रारि भइलि, बीरन के बीर पुकार भइलि।


बलिया का ‘मंगल पांडे के, बलिबेदी से ललकार भइलि ॥1॥

‘मंगल‘ मस्ती में चूर चलल, पहिला बागी मसहूर चलल।

गोरन का पलटनि का आगे, बलिया के बाँका शूर चलल ॥2॥

गोली के तुरत निसान भइल, जननी के भेंट परान भइल।

आजादी का बलिवेदी पर, ‘मंगल पांडे‘ बलिदान भइल ॥3॥

जब चिता-राख चिनगारी से, धुधुकत तनिकी अंगारी से।

सोला निकलल, धधकल, फइलल, बलिया का क्रान्ति पुजारी से ॥4॥

घर-घर में ऐसन आगि लगलि, भारत के सूतल भागि जगलि।

अंगरेजन के पलटनि सारी, बैरक से भागि चललि ॥5॥

बिगड़लि बागी पलटनि काली, जब चललि ठोंकि आगे ताली।

मचि गइल रारि, पडि़ गइलि स्याह, गोरन के गालन के लाली ॥6॥

भोजपुर के तप्पा जाग चलल, मस्ती में गावत राग चलल।

बांका सेनानी कुँवर सिंह, आगे फहरावत पाग चलल ॥7॥

टोली चढि़ चलल जवानन के, मद में मातल मरदानन के।

भरि गइल बहादुर बागिन से, कोना-कोना मयदानन के ॥8॥

ऐसन सेना सैलानी ले, दीवानी मस्त तूफानी ले।

आइल रन में रिपु का आगे, जब कुँवर सिंह सेनानी ले ॥9॥

खच-खच खंजर तरुवारि चललि, संगीन, कृपान, कटारि चललि।

बर्छी, बर्छा का बरखा से, बहि तुरत लहू के धारि चललि ॥10॥

बन्दूक दगलि दन-दनन्दनन्, गोली दउरलि सन्-सनन् सनन्।

भाला, बल्लम, तेगा, तब्बर बजि उठल उहाँ खन्-खनन् खनन् ॥11॥

खउलल तब खून किसानन के जागल जब जोश जवानन के।

छक्का छूटल अंगरेजनि के, गोरे-गोरे कपतानन के ॥12॥

बागी सेना ललकार चललि, पटना-दिल्ली ले झारि चललि।

आगे जे आइल राह रोक, रन में उनके संहारि चललि ॥13॥

बैरी के धीरज छूटि गइल, जन्नु घड़ा पाप के फूटि गइल।

रन से सब सेना भागि चललि, हर ओर मोरचा टूटि गइल ॥14॥

तनिकी-सा दूर किनार रहल, भारत के बेड़ा पार रहल।

लउकत खूनी दरिआव पर, मंजलि के छोर हमार रहल ॥15॥

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लेखक परिचय:- 

नाम: प्रसिद्ध नारायण सिंह 
जनम: जुलाई 1901
जनम थान: चित बड़ागाँव, बलिया, उत्तरप्रदेश
रचना: बलिया-बहार, बलिदानी बलिया, फुलडलिया 
अंक - 73 (29 मार्च 2016)

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