संपादकीय

सदा आनन्द रहे एही द्वारे - केशव मोहन पाण्डेय

मनमौजी हुड़दंग, मौज-मस्ती आ सबके सतमेझरा रंग में रंग देबे वाला होली के लोक-पर्व से के बचत होई? ना केहू बचत होई आ ना केहू बचे के चाही। एह मौसम में त पेड़ो-खूँट बउरा जाला, मनई के मन त बउरइला के साथे अगराइओ जाला। फगुआ के फाटक खटखटावते सभे तनी दोसरे नियर बोले लागेला। ई सब शहर से दूर त रहबे कइल ह, अब एकर रूप गाँवो-देहात में बदल गइल बा। अब ना ढोलक के नाल चढवला के गरज पड़ेला आ ना झाल झनकवाला के। अब फगुआ के सगरे रंग एगो कैसेट के दुअर्थी गीतन में कैद हो के फेंकरत लागेला। कारन कवनो होखे बाकिर होली के बेर हमार मन मचले लागेला। 
साँच कहीं त जब-जब होली के बेला आवेला, हमके अपना लइकाईं में गाँव में बितावल होली के पल ईयाद आ जाला। ई शब्दवे सुनके हमके अपना गाँव-टोला के ईयाद से हमार मन भर जाला। ओह बेरा ईयाद जीभ पर लेमचूस बन के जीभ पर लाहे-लाहे घुले लागेले आ मन मचले लागेला। मन अपने आप भगवान के करूणा पर द्रवित हो जाला आ कोठा-कोठा अपना जिनगी के बितल पल के जोहे लागेला। समय के साथे घूमत मन चाहे जिम्मेदारी के बोझा से दबाइल होखे, चाहे समय के माँग से, चाहे जीवन-लीला के विविध पात्र के पात्रता से, बाकीर मन त ईयाद के भँवर-जाल में अझुराते रहेला। ओह अझुरइला में खली लइकाईं के सौंदर्यबोध रहेला, अउरी कुछू ना। ऊ सुन्दरता अमरखो में मिलेला, सहयोग में मिलेला। ठाढ़ी-टीका से ले के ओल्हा-पाती, आइस-पाइस जइसन खेलो मे मिलेला त कामो-धंधा में। आफतो-बिपत में मिलेला, त उत्सव-उछाहो में मिलेला। सगरो बेचैनियों में मिलेला त सगरो स्वादो में, सगरो अभिरूचियो में मिलेला। 
साँच बात त ई रहे कि हमरा टोला के लोग कम पढ़ले-लिखले रहे। जे पढ़ले-लिखले रहे, ऊ खाली साक्षरे ना, ज्ञानी रहे लोग। ओह में कुछ लोग सरकार के सेवा में रहे लोग आ कुछ अपना खेती-किसानी आ नून-तेल-लकड़ी के व्यवस्था में रमल रहे लोग। हमनी किहाँ होली के रंग सरस्वती पूजा के दोसरके दिन, सरस्वती माई के मूर्ति के भसाने से लउके लागे। भसान करे लाए के बेरा सब लइका लाल, गुलाबी, पीअर, नीला, हरिहर अबीर के बरसात करत चारू ओर इंद्रधनुष बनावत जा सों आ आवे के बेरा सर..र.र र र के लय पर ‘रामनगर-धूमनगर’ के भौगोलिक आकलन के सथवे शब्दन के बान्ह तुर के ‘पुरुआ-पछुआ’ के चाल पर अशोभनीय जोगीरा कहत आवें सों। ऊ सगरो रहे त बाउर, बाकिर केहू के बाउर लागे ना। आज सोचेनी त बुझाला कि या त हमनी के समझ ना रहे, या जोगीरा के जोश में हमनी के समझे के ना चाहीं जा। या त ऊँहा ले आजु के बात-बात में सहिष्णु आ असहिष्णु भइला-बनवला के राजनीति ना रहे, या उत्सव के राजनीति के दखल कम रहे। अब रउरा ज्ञान के अभिनय कहीं, चाहे अनुभवी समय के मार, चाहे उम्र के बोझ, चाहे होशियार कहाए के लालसा, होली की ओह मांसल आ अशोभनीय शब्दन के ईयाद क के अपने आपे पर ग्लानि होला आ मन बोझिल हो जाला। 
फगुआ के फगुनहट रंग हम अपना टोला भर के भाई लोग पर कुछ अलगही रंग में देखले बानी। ओह बेरा हमरो गाँव बाकी अन्य गाँवन जइसन जातिगत सीमा में कैद रहे, बाकीर होली के रंग में सगरो बान्हा टूट जाव, सगरो सीमा मेटा जाव। भाई लोग में केहू होरील ब भौजी से गारी सुने के चाहे त केहू फागु ब भउजी के सगरो होली भर आपने समझे। ओह सहज जीवन में शब्दन के दूअर्थी चाल से सबके चुभनो अनुभव होखे आ गुदरावनों बरे। जहीर भाई ब से लाइफ-ब्याय साबुन माँगे के अर्थ त हम आजु ले ना समझ पवनी। बोधा, जटा, सँवरू लोहार आ फेर नागू आदि के जबे केहू देखे त शब्दन के चाल से अपना कला के प्रदर्शन जरूरे करे। तब बुझाव कि होली एही के त कहल जाला। 
वसंत के त ऋतुअन के राजा कहल जाला आ होली त वसंत के उत्सव ह। एह तरे अगर होली के उत्सवराज कहल जाव त हरज कवन बा आ ना कवनो अतिशयोक्ति बा। एह उत्सव में अल्हणता आ आनन्द एगो क्रम में पावल जाला। अपना भोजपुरी क्षेत्र में एह उत्सव के हर विधी में क्रमबद्धता देखल जाला। वसंतपंचमीए से लोग केहू के दुआर पर चाहे कवनो मंदिर में, चाहे कवनो चैराहे पर एकत्रित होके देर रात ले ढोलक-झाल बजा-बजाके फगुआ गावेला लोग। उत्सवराज खातिर गावत ओह गीतन के फगुआ चाहे होली कहल जाला। एकर अलग-अलग स्थान पर अलग-अलग नाव दिहल बा। ई त सहीए ह कि ‘कोस-कोस पर पानी बदले, चार कोस पर बानी।’ राजस्थान में लूर, लूवर चाहे घूमर कहल जाला त मैथिली में फाग आ अपना भोजपुरी में फगुआ या ताल ठोंकलो कहल जाला। एतना कहला के कवल गरज बा जी, अगर केहू खाली ‘सर र र र र र’ कहि दे त सगरो कहला-सुनला के अर्थ सभे समझ जाला। 
ई त सब जनबे करेला कि होली मनवला के पहिलका रात के सम्मत जरावल जाला। ओही सम्मत जरवला के होलिका-दहनो कहल जाला। अपना भोजपुरी क्षेत्र में एगो बाँस के कवनो चैराहा चाहे कवनो एकांत ठाँव पर हला दिहल जाला। ओह पर सूखल पतई, गोहरा-गोंइठा, खर-पतवार आदि डालके जरावल जाला। हमरा किहां त सम्मत जरवला के मुखग्नि देहला से जोड़ के ताना कसल जाव। मजाक उड़ावल जाव। सम्मत के ओह आग में लोग नया अन्न (गेहूँ, जौ आदि) होरह के प्रसाद के रूप में घर ले जाए लोग। ओह सम्मत जरावला के बेरा मन भर गारी गावल जाव - 
‘अर र र भइया हो, 
सुन लेब मोर कबीर।’ 
मनव-मन हर काल, हर दषा में उत्सवन के प्रेमी रहल बा। आदमी के आदतन पर देश, काल आ वातावरण के असर त पड़बे करेला। भारत में त रोजो कवनो-ना-कवनो उत्सव-त्योहार के आयोजन होत रहेला। ईंहाँ के धरती पर रोजो उत्साह, उमंग, पर्व, त्योहार, सभ्यता, संस्कारन के आयोजन होत रहेला। भारत में जाति, धर्म, पर्व, मौसम आ ऋतुअन पर आधारित, ओहसे प्रेरित अनगिनत उत्सवन के आयोजन होत रहेला। माघ महिना के अँजोरिया के पंचमी के वसंत-पंचमी कहल जाला। एह के आधार पर हम कह सकत बानी कि ऋतुअन से प्रभावित, ऋतुअन से प्रेरित भारत के भोजपुरिया धरती पर होली के उत्सव ओही वसंत-पंचमी से आरंभ हो के फागुन महिना के पूरनमासी तिथि ले मनावल जाला। सगरो देश में एक्के साथे होली के रंग चढ़ेला। भोजपुरी क्षेत्र में त होली के एगो अलगे महŸव ह। एह माटी पर आ एह माटी के लोग खातिर होली जीवन हो जाला। अगर देखल जाव त ओह जीवन में एगो अलगहीं उमंग बा। अपनापन बा। आकर्षण बा। गरिमा बा। पहचान बा। लइकाईं में हम कई कारने होली के दिने अपना सगरो इलाका में घूमल बानी। हम एह गरिमा आ पहचान केे अनुभव करत बानी। अनुभव क के आनन्दितो होत बानी। एक बेर फेर से मन में लालसा रहे ओह सौन्दर्य के होली के रंग आ नजर से निहारने के। खास कर फागुन में। 
हर क्षेत्र के आपन-आपन विषेशता होला। हमरा भोजपुरी क्षेत्र के समरसता विशेषता त हइए ह, एगो दोसरो विशेषता ह। ईंहँवा के लोग गिरमिटिया मजदूरन के रूप में, ज्यादा तादाद में, अंग्रेजन द्वारा फिजी, गयाना, मारिशस, त्रिनीडाड आदि देशन में ले जाइल गइल रहे लोग। ईंहवा के लोगन में सरलता आ अशिक्षा त बा, सथवे बेहद परिश्रमीयो होला लोग। धूसरो माटी उर्वरा पैदा करे में सक्षम होला लोग। गंडक के किनारे के हाल त अलगहीं होला। हमार टोला पूरी तरह से गंडक के गोद में रहे। अगर सगरो भोजपुरी क्षेत्र के भौगोलिक स्थिति देखल जाव त गंडक के अलावा गंगा जी, सरयू, घाघरा, कर्मनाशा के सथवे अनगिनत छोट-बड़ नदियन से प्लावित बा। ई भोजपुरी क्षेत्र समतल बा आ बहुते उपजाऊ बा। एह क्षेत्र के उर्वर माटी के कारने मसुरी, खेसारी, मटर, रहर, बकला जइसन दलहनन के फूलन से लेके पूरा साल कबो अड़हुल, बागनबेलिया, बेली, गुलाब, सेमर, गुलदाउदी, गेंदा, जूही, रजनीगंधा आदि खिलल-मुस्कुरात फूलन के छटा लउकते रहेला। ईंहवा के खेतन में अपने-आप भांग त उगबे करेला, सथवे सरसों, तीसी, सूरजमुखी के रूप के का कहल जावा? अइसन लागेला कि केहू प्रकृति रानी के पिअर चुनरी ओढ़ा के सजवले बा। अइसन प्राकृतिक धन-दौलत से सजल जिनगी अगर अल्हड़ बतास नियर मस्त-मौला होखे त अचरज कइसन! आ ईहे सुभाव त भोजपुरी माई के अँचरा के विशेषता ह। सच्चाई ई बा कि अगर जीवन के एह रूप के अगर भर आँख देखे के होखे त कबो एह क्षेत्रन में होली जा के देखीं। एह क्षेत्रन के होली गा के देखीं। कहीं-ना-कहीं ढोलक की नाल चढ़ाकर बावरा मन वाला मस्त मानव के टोली मिलिए जाई - 
संउसे सहरिया रंग से भरी, 
केकरा माथे ढारूँ अबीर, हो 
केकरा माथे ढारूँ अबीर? 
होली पर गावे वाला फगुआ के कई विशेषता ह। जइसे कि गावत-गावत शब्द भले थोड़ी देर खातिर रूक जाय, बाकीर कबो लय ना टूटेला। मन के खुला छोड़ देबे वाला बौराइल देवर अपना कवनो भउजी के देख के गावे लागेला - 
आ हो भौजी, 
तोरा नइहरवा कुँआरी बहिनिया भौजी, 
कह त गवना करा के लेइ आईं।। 
भोजपुरिया माटी के अलगही महिमा होला। लगभग डेढ़ महिना ले चले वाला सबसे बड़का एह होली के उत्सव में लइका, बूढ़ आ जवान, सभे एक्के उमिर के हो जाला। ना कवनो उमिर के भेद रहेला आ ना कवनो धन-दौलत के मान-अभिमान। होली के दिने सबके जीवन एक्के लखां हो जाला। एक रंग में सरस। एक स्वर में मुखर। सभे उन्मादित हो जला। आदमी से ले पशु होखे चाहें प्रकृति। एही कुल गुन के कारने हर साल होली आवते हमार मन कवनो खरिहान में बइठकी लगवले कवनो होली टेरत गायक लोग के झूंड में पइस जाए के चाहेला। ई भोजपुरिया होली गायकी के विशेषता ह कि कवनो खलिहान भा बगीचवे से परम्परागत रूप से फगुआ गावल शुरू कइल जाला। लइकाईं में तब ऊँहवाँ जमघट होखे लागी। तब टोला के कवनो कोना से ढोलक-झाल के झुमावे वाला स्वर-लहरी सुनाए लागे। लोग जुमे लागे। भयवद्दी वाला लोग के अधिकता रहे। काका लोग के आइल त वर्जित ना राखल रहे, बाकीर कुछ जने आइओ जाव लोग। कुछ जाने बेभरम भइला से बचे खातिर दूरे से कान दे लिहल उचित समुझे लोग। ओह बेरा गायक लोग के, नवहियन के, नौजवानन के, मतवना में मातल बूढ़वनों के, सबके फगुआ के धून पर लरजत आवाज फगुनी बयार पर चढ़के वातावरण में तैरे लागे। हमनी भोजपुरियन के ई परम्परा रहल बा कि होली के दिने फगुआ गावे वाला लोग सबके दुआरे जा के फगुआ गावे लोग आ हमनी के ओह गायक भाई लोग पर रंग डाली जा, अबीर मली जा आ गरी-छुहाड़ा खिआ के भेंट-अँकवार करीं जा। हर साल होली के दिने हमरो घरे रसोई से लहसून-पिआज के गंध आवे। गायक भाई लोग जब दुआर पर दुआर पर आवे लोग त पिताजी अबीर के थरिया आँगना से मंगवावें आ सबके अबीर लागे। हमहूँ तनी सा बाबुजी के अबीर लगा के उनके चरण छुईं। 
अब त समय के अइसन रंग बा कि हम ना जा पावेनी। ना गायके लोग आवे ला आ ना हमार बाबुजी बाड़े। ईयाद क के आँख त भरिए जाला। खैर, तब गायक भाई लोग ढोलक-झाल के स्वर के साथे फगुआ गावल शुरू करे लोग। गावते गावत सभे झाल चलावत धीरे-धीरे ऊपर उठे लागे लोग। अदालत भाई शुरू करें - 
शिव भइले दयाल, शिव भइले दयाल 
गंगा लेअइले भागीरथी।। 
ई भगवान शंकर के प्रार्थना ह। ई लोक-मान्यता ह कि शुभ काम ईश्वर के प्रार्थना से शुरू होला। ..... .हे शिव बाबा, रउरा जे तरे भगीरथ पर प्रसन्न भइनी आ परम पावनी गंगा मइया धरती पर आ गइली, ओहि तरे हमनीयो पर प्रसन्न होके हमनी के कामना पूराईं। ऊहे गीतिया बार-बार दोहरावल जाला। कुछ देर बाद एगो समवेत स्वर उठेला - 
हो हो हो शिवऽ, आ हो हो हो शिवऽ। 
आ हो शिव भइले दयाल, शिव भइले दयाल 
गंगा लेअइले भगिरथी।। 
गीत के गति तेज होत जाला आ आवाज ऊँच। ढोलक-झाल आ खजड़ी-ताली के आवाज में सभे झूम उठे। झाल वाला छवारिक खड़ा होके नाचे लागे। झाल के दम भर जोर-जोर से पीटे लागे। सभे ठेहून पर खड़ा होके ओकरा ओर मुखातिब होके, हाथ भाँज-भाँजके गावे लागे लोग - 
हो हो हो शिवऽ, आ हो हो हो शिवऽ। 
आ हो शिव भइले दयाल, शिव भइले दयाल 
गंगा लेअइले भगिरथी।। 
ऊ दृश्य देख के बुझाव कि सबपर एगो मतवना छपले बा। सभे गावते-गावत ऊपर उठे, नीचे उतरे आ ऊँचका सुर में, जोर-जोर से, ढोलक-झाल बजा-बजा के फगुआ के ओह गीत के समापन करें। एक दुआर पर कम-से-कम एगो गीत त होखबे करे। कबो-कबो त एक्के दुआरे दू-तीनो गीत हो जाव आ जब गायक लोग उठे लागे तब आपन शुभकामना गावे लागे लोग। ओह लोग के शुभकामनवा हमरा शिशु मन के गदगद क दे - 
सदा आनन्द रहे एही द्वारे 
मोहन खेले होली हो। 
एक ओर खेले कुँअर कन्हैया 
एक ओर राधा गोरी हो।। 
फगुआ के गीतन के गति, भाषा-बंधन आ स्वर-संधान एकदम्मे मृदुल आ मोहक होला। फगुआ गावत बेरा लोग एक-एक टेक के दसों बार आवृ
ति 
करेला लोग। होली हृदय से उत्सर्जित उत्सव ह। ई उत्सव जन-मानस के हृदय से निकलेला आ जन-मानस के हृदय ले पहुँचेला। भारत के सामाजिक व्यवस्था में जब वर्णाश्रम के व्यवस्था रहे, ओह बेरा उत्सवनो के वर्गीकरण भइल रहे। ब्राह्मण खातिर सावन के उत्सव त शुद्र खातिर होली के त्योहार। हमरा लागेला कि ओह बेरा समाज में आन्तरिक लगाव के अभाव रहे, बाकीर एह उत्सवन के बहाने सामान्य से विशेष ले, सभे एक-दोसरा से जुड़ जाव। सामाजिक का व्यक्तिगत प्रेम के रंगीन बुलबुला आ प्रकृति के मोहक चित्रवे त फगुआ के रंगीन ताना-बाना ह। -
‘कहवाँ बोले मोर -2 
कहवाँ बोले पपीहरा, 
कहवाँ सइयाँ मोर -2।’ 
सचहूँ होली आनन्द आ मौज-मस्ती के उत्सव ह। होली के गीतन में उछाह आ खुशी के वर्णन स्वाभाविक रूप से रहेला। भोजपुरी मन अपने सब उत्सव आ आनन्द के अपना देवी-देवता लोग से जोड़ देला। होली के रंग में भिजल हमनी के लोक-जीवन में स्नेह के प्रतीक राधा-कृष्णो लउके लागेला लोग। रउरो देखीं ना, - 
‘जहवाँ सोलह सौ बृजनारी, 
तहवाँ अकसरूवा कृष्णमुरारी 
भरि-भरि मारे पिचकारी, 
तब भींजे राधिका साड़ी।’ 
राधा-कृष्ण के वर्णन वाला एगो अउरी फगुआ देखीं - 
राधे घोरऽ ना अबीर, राधे घोरऽ ना अबीर, 
मंड़वा में अइलें कन्हईया। 
भोजपुरिया माटी के होली में कहीं मारुति-नंदन लंका में जा के होली मचावत लउके ले त कहीं राम आ सीता जी होली के रंग में रंगीन हो के एक-दोसरा पर सोना के पिचकारी से रंग फेंकत लउकेला लोग। - 
‘केकरा हाथे कनक पिचकारी 
केकरा हाथे अबीरा, 
सीता चलेली अवधवा के ओर 
होलीया खेले राम लला।’ 
एगो दोसर गीत देखीं - 
रामऽ खेले होरी, लछुमन खेले होरी, 
लंका में राजा रावण खेले होरी, 
अजोधा में भाई भरत खेले होरी। 
हंसेला जनकपुर के लोग सभी हो 
लइका राम धनुषऽ कैसे तुरिहें? 
फगुआ के गीतन में सूक्ष्म भावन के अभाव के सथवे संभोग-शृंगार के रीति के अनुकूल चित्रण रहेला। - 
‘गोरी भेजें बयनवा हो रामा 
अँचरा से ढाँकि-ढाँकि के।’ 
फगुआ में कबो-कबो लोक-जीवन सं जुड़ल चीजन के वर्णन मिल जाला। कई गीतन में घाटन, नदियन, व्यक्तियन आ स्थाननो के वर्णन दिखाई देला। - 
‘एक घाट रमरेखा हो -2 
जहाँ बकसर के नहान, 
घाट बिगाड़े ताड़का 
मरनी भगवान -2।।’ 
आज के भौतिकवादी समाज में अपना वैयक्तिक स्वाथं से अलगे जाति भेद , वर्ग भेद, धर्म भेद, वर्ण भेदो से अलग हो के लोग भेद-शून्य हो के होली के उत्सव मनावेला। बभनठोली होखे चाहें चमरटोली, भोजपुरिया माटी में त होली के रंग में सभे एकही टोली के लउकेला। अहिरटोली के बीरबल भाई चाहे बलिस्टर अंसारीयो ना बाचे लोग। तब बीरबल भाई के बिआह ना भइल रहे, अबो ना भइल होई। ओहि बेरा ऊ चालीस के करीब रहले। खैर, ऊ दूनो जने के त केहू ना छोड़े। बंडा आ लवंडा के पर्याय बनल दूनो जना के फगुआ आ जोगिरा में कुछ विषेश विशेषणों के साथे प्रस्तुत कइल जाव। तबो सबकुछ सुनवला के बाद लोग होली के रंग में सबके रंगीन क के आ अपनहूँ रंगीन हो के गले लागे लोग आ दुआर से जात बेरा फेर से हार्दिक शुभकामना व्यक्त करे लोग - 
‘सदा आनन्द रहे एही द्वारे 
मोहन खेलें होरी हो, 
एक ओर खेलें कुँअर कन्हैया 
एक ओर राधा गोरी हो।’ 
होली के उन्माद भांग, गांजा, शराब आ धतूरो से अधिका उन्मादित करेला। होली के लहर सागर के उठत-गिरत लहरो के पराजित क देला। होली चाहे कवनो क्षेत्र के होखे, कवनो भाषा आ समुदाय के होखे, होली प्रेम, उछाह, शृंगार, अपनापन आ भाईचारा के उत्सव ह। होली वासंती गीतन के लहरदार फगुआ के उत्सव ह। होली भारत के उत्सव ह जवन जो भोजपुरिया माटी में अउरी रंगीन हो जाला।
आज के समय में नौजवानन के लग्गे सब सुख बा। बस, समइए नइखे। समय खातिर दौड़ लगावत लोग जहवाँ अपना लोक परम्परा आ रीति-रिवाज, उत्सव-त्योहार से विमुख होत लउकत बा लोग। हमनी के समझे के चाहीं कि लोक परम्परा आ रीति-रिवाज, उत्सव-त्योहार आदि हमनी के पहचान रूपी वट-वृक्ष के माटी ह। माटी दरकी त केतनो मजबूत दरख्त होखे, माटी मिलिए जाई। 
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लेखक परिचय:-

2002 से एगो साहित्यिक संस्था ‘संवाद’ के संचालन। 
अनेक पत्र-पत्रिकन में तीन सौ से अधिका लेख 
दर्जनो कहानी, आ अनेके कविता प्रकाशित। 
नाटक लेखन आ प्रस्तुति। 
भोजपुरी कहानी-संग्रह 'कठकरेज' प्रकाशित। 
आकाशवाणी गोरखपुर से कईगो कहानियन के प्रसारण 
टेली फिल्म औलाद समेत भोजपुरी फिलिम ‘कब आई डोलिया कहार’ के लेखन 
अनेके अलबमन ला हिंदी, भोजपुरी गीत रचना. 
साल 2002 से दिल्ली में शिक्षण आ स्वतंत्र लेखन. 
संपर्क – 
पता- तमकुही रोड, सेवरही, कुशीनगर, उ. प्र. 
kmpandey76@gmail.com 
अंक - 72 (22 मार्च 2016)

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