संपादकीय

परीत पनके द मानवा के मोजराये द - जनकदेव जनक


'मत रहियो पिया परदेस आया फागुन रे...'


फगुआ खेलत मेहरारूअन के टोली आगे बढ़ जाता. टोली के बोली पर हमरो मन होलिया गइल. फगुआ के रंग में डुबकी लगाये खातिर बेताब होखे लागल. बाकिर रह रह के मन मायूस हो जाव कि हमरा नियर बंडा सियार आ ऊपर से करी्अठ पर के रंग डाली. बाकिर दिल के एगो कोना में नोनियवा घास नियर आसा के किरन जामल कि होली ह. एहमें उमिर आ करीआ -गोर ना देखल जाला. ई विचार आवते दिल दरियाव हो गइल. भीतरे भीतरे अगराये लागल. कबनों गोरकी भउजी मिल जइती त उनुका ऊपर एक बाल्टी हरिहरका रंग डाल देती आ उ. ऐने ओने कुछ कहती त उनुकरा सुघर गाल पर लालटेस रंग पोत देती. तब उ हमरा से पीछा छोड़ावत भगती. भाई बिपीन बहार के गीत गावते, ‘धीरे से रंगवा डालू रे देवरा भीतरा लागे ला पाला रे......’ अबहीं हम ई बात सोचते रही कि बेकहली भउजी, फेकनी भउजी, लगनी भउजी, मनतुड़नी भउजी आदि के टोली हमरा सामने खड़ा हो गइल. हम आपन रंग पिचकारी सरीयावे के कोशिश में रही, तले एकाएक हमारा ऊपर उ लोग मधुमक्खी नियर टूट पडल. हमार जमुनिया रंग के बदरंग कर देलस लोग. सपाट आ सिलेटी चेहरा पर सिल्वर कलर के अबीर चानी लेखा चमके लागल. पिअरका आम खानी पिअर दगदग अबीर आ ओढुउल के फूल नियर गुलाल चेहरा के शोभा बनावत रहे. तभी बेकहली भउजी हमरा चेहरा पर करीआ आ बैगनी रंग पोत दिहली. ई देख के उनुकर सब सखी लोग हंस पड़ल. गोरकी भउजी ई कहते जाई लागली कि देवरा के मुंहवा त करीखाही हांड़ी खानी लागत बा. 

भउजाई लोग त मुंह पर करीखा पोत के भाग गइल. जइसे हम कवनों अपराध कइले होखी, पंचायत में सजा हमरा के गदहा पर चढ़ा के सउंसे गांव घुमावे के मिलन होखे. एकाएक हमारो त्रिनेत्र जाग उठल. कवन कवन भउजाई का का गुल खिलावलें बाड़ी, परदेसीअन के ना आइला पर ऊ लो कातना लेड़वाड़ी आ बांसवाड़ी गुलजार कइले रही. उ सब हमरा सीसी कैमरा में कैद रहे. ओकर झलक हमरा दिमाग पर नाचे लागे. बुरा मत मानी भउजी फगुनहट बेयार चलत बा. भाई मोतीलाल मंजुल अइसन भउजइयन पर ठीके आपन बान मरले बानी, ‘तोहार चिट्ठिया देखा दी त मार हो जाई, तोपल जिनिगिया उघार हो जाई.....’ 

मुंहकरखी लगला के बाद सीधे हम अपना बथानी कावर भगनी. कतही हमरा सरधा के अरथी ना उठ जाव. अगराइल मन थोड़ हो गइल रहे. अबही बथानी में ठाड़ होते बानी कि हमार नजर ताड़ी खाना पर चल जाता. परशासन के बंदी के बाद भी बिटामिन एम के बदउलत खुलल रहे. ओकरा में से चुपके से निकलत कवि अनिल अलमस्त आ वीरेेंदर मिसिर पर नजर पड़ गइल.उ लोग बड़ा सादगी के साथे एगो गीत गावत रहे, ‘ परीत पनके द मानवा के मोजराये द, हर सपन के सुगंधी बिखर जाये द. हंसतं हंसते फगुनवा संगे जिनगी , गीत गावते गंवें से गुजर जाये द...’.ओही टाइम लगनी भउजी पता ना कहवां से उहां अपना टोली के साथे टपक पड़ली, ‘बलम पिचकारी जो तुने मुझे मारी.....के छटपटाहट में उ बेचैन रही. ओही आपा धपी में अनिल जी से टकरा गइली. हाथी नियर मोट देह पातर छीतर कवि अनिल जी पर भहराइल. उनुकर नाशा चिरई लेखा फुर्र हो गइल. सब कवियाइल पीछे छूट गइल. नीचे दबल उ बाप ..बाप... बोलत रहस. भाई वीरेंदर मिसिर केहूं तरी अनिल जी के हाथी के नीचे से निकाल के राहत पहुंचावे के कोरसिस में रहस. ठीक ओही घड़ी बुढऊ कवि उमेशचंद्र नील जी ,‘रंग भरल पचकारी खेलत बाड़ी फाग, अन बिआहल गालन पर इंद्रधनुषी रग के छाप, अंग अंग चित्रकारी लेखा, भउजी के गदराइल देह कमाल के ...., गीत गावते घेरा गइले. भर फागुन बुढ़वा देवर लागे के तरज पर नील जी के नख सिर रंग में सराबोर हो गइल. तीनु कवियन के लसरात देख के हमार मन प्रफुल्लत भइल. मन के राहत मिलल कि महिला सशक्तिकरण के बात सरकार पुका फाड़ के अइसही नइखे चिल्लात. महिला अब अबला ना सबला हो गइल बाड़ी. अच्छ बा कि हमनी किहां लट्ठमार होली नइखे. 

आखिर में हम खाये पीये वालान से इहे कहब कि , 

‘ताड़ी ह जग तारिनी 

जस गंगा सामान, 

बैंकुठ जाये के होखे त 

पिहीं गिलास पर गिलस.'

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लेखक परिचय:-

पता: सब्जी बगान लिलोरी पथरा झरिया,
पो. झरिया, जिला-धनबाद 
झारखंड (भारत) पिन 828111,
मो. 09431730244


अंक - 72 (22 मार्च 2016)

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