संपादकीय

मिलाप क परब होली - जलज कुमार अनुपम

सारा ऋतुवन के राजा वसंत के मौसम में फागुन के पूर्णिमा के मनावे जाये वाला इ परब आनंद के बयार बहावे में हर साल सक्षम होला आ भारत के पुरातन गौरवशाली इतिहास के परिचय भी करावेला
 होली इ बतावे के प्रयास करेला की होली के जइसन ही जीवन भी रंग से भरल होखे के चाही
। 
बेरंग के दुनिया केहू के निमन ना लागेला, हमनी के जीवन के कई गो रंग होला ,कई गो ओकर रूप होला काहे की जब सब रंग मिल जाला एके में त उ करिया लउकेला, एहिसे हर रंग के पहचान होखे लायक रखे के चाही, न त उ करिया धब्बा बन जाई। सब केहू के जीवन में अलगे अलगे जगह पर ओकर अलग अलग रूप का एगो मर्द जात कही बाप त कही बेटा त कही पति त कही मालिक चाहे सेवक ओईसही औरत के भी अलग अलग रूप बा। हर केहू के निजी जीवन में भी रंग हर मोड़ पर मौजूद बा जइसे कह सकत बानी की क्रोध के लाल, ईर्ष्या खातिर हरिहर , आनंद खातिर पीअर , प्रेम के गुलाबी, आकाश से तुलना खातिर कबो नीला, शांति खतिरा उजर, बलिदान खतिरा केसरिया अउरी ज्ञान खतिर जामुनीया रंग के हमनी के प्रयोग करनी जा आ सबकर एगो जगह पर आपन आपन मतलब बा।
वइसे त बहुत सारा पौराणिक कथा कहानी बाटे होली के बारे में बाकिर जवान सबसे मशहूर बा उ ई बा की एही दिने हिरण्यकशिपु के बहीन होलिका के मुवला के ख़ुशी में इ मनावल जाला। पुराणों में वर्णित बा की हिरण्यकश्यपु जे एगो राक्षस रहे आ उ अपना आप के भगवान समझे लागल आ आपण पूजा लोगन से जबरदस्ती करवावे लागल आ ओके बेटा प्रहलाद रहले जे बिष्णु भक्त रहले आ उ हिरण्यकश्यपु के बात ना मानले
 हिरण्यकश्यपु प्रह्लाद के हर तरह के दंड देवे के प्रयास कईले लेकिन भगवान बिष्णु के मदद से उ बार बार बच जास ओहिसे हिरण्यकश्यपु अपना बहीन होलिका जे वरदान के प्रभाव से हरेक दिन अग्निस्नान करत रहली आ जलत ना रहली उनका के हिरण्यकशिपु प्रह्लाद के गोदी में लेकर अग्निस्नान करे खातिर कहले। उ समझलें कि अइसन कइला से प्रह्लाद अग्नि में जल जइहे अउरी होलिका बच जइहे। होलिका अइसनके कइली , बाकिर होलिका जल गइली आ प्रह्लाद बच गइलन आ तबे से होलिका के रूप में सेमत जारी लागल आ ओकरा बिहान भइला होली मानावे के प्रथा चल पड़ल।
आज के भाषा में कहल जाव त होली शुद्ध सेक्युलर हवे आ सनातन के एह अनुपम भेट से केहू अछुत नइखे रहल
 एह परब के का का बड़ का छोट का अमीर का गरिब, का राजा का रंक सब केहु एक समान आज ले मनवले बा
। 
इतिहासकार लोग त कहेला की आर्य लोग भी एह परब के मनावत रहे लोग आ होली के वर्णन त नारदपुराण आ भविष्यपुराण में भी बाटे। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर ईसा से ३०० बरिष पुरान एक अभिलेख में भी एकर उल्लेख कइल गइल बा
 सुप्रसिद्ध मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी भी अपना ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव के वर्णन कइले बाड़न। भारत के अनेक मुस्लिम कवि लोग भी अपनी रचना में होली के बात के उल्लेख कइले बाटे लोग की होलिकोत्सव केवल हिंदू ही ना मुसलमान भी मनैव हैं। सबसे प्रामाणिक इतिहास की तस्वीरें हैं मुगल काल की और इस काल में होली के लें। इतिहास में वर्णन बाटे कि शाहजहाँ के ज़माने में होली के ईद-ए-गुलाबी भा आब-ए-पाशी (रंग के बौछार) कहल जात रहे। अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के बारे में प्रसिद्ध बाटे कि होली पर उनकर मंत्री उनका के रंग लगावे जात रहे लो। संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया से लेके, अमीर खुसरो चाहे बहादुर शाह ज़फ़र सब केहु होली पर लिखले बा।
होली के इतिहास बहुत पुरान बा आ एकरा के बहुत जगह बसंतोत्सव भी कहल जाला लेकिन हमनी किहा इ होली भा होरी कहाला
 हमनी किहा झाल ढोलक हरमुनियम के संघे फगुआ चढ़ते फागुन से गावावे लागेला जवान होली के साझी ले चलेला आ ओकरा बाद चैती उठा के फगुवा के खत्म कइल जाला
 रंग के का पूछे के बा उ त देव उठान मतलब कही त गोधन कुटाई के बड़े से चालू हो जाला। हमनी किहा के फगुवा के गीतन में जोगीरा के अलग अंदाज आ मजा बाटे, होली के शुरुआत त सेंमत जरला से होला आ ओकरा बाद धुरखेल आ फेरु रंग के झमाझम बारिश आ सांझी खानी गुलाल से होली मानावे के रीत बा। एह दिन सब केहू के घरे तरह तरह के पकवान बनेला आ लोग बाग दोस्ती के साथे साथे आपन सारा दुश्मनी भी भुला के होली खेलेला ।फगुआ मौज आ मस्ती के भी प्रतिक मानल जाला।
होली में गीत के आपन अलगे मजा बाटे जब गाव में गीत उठेला त गावल जाला
घरहीं कोशिला मैया करेली सगुनवा,
बने बने राम जी का बीतेला फगुनवा।
आ ओकरा बाद जे केहु मनई कढावेलें की
रामऽ खेले होरी, लछुमन खेले होरी,
लंका में राजा रावण खेले होरी,
अजोधा में भाई भरत खेले होरी।

हंसेला जनकपुर के लोग सभी हो
लइका राम धनुषऽ कैसे तुरिहें?
मान ली भइया इ गीत होली के राष्ट्रीय गीत ह पूर्वांचल ला आ एह्पे सब केहु झूमे पर मजबूर हो जाला अब त धीरे धीरे इ हर जगह गावल आ बजावल जात बा। 
हमरा मन परत बा कुछ आन्तरा हम जरूर कहेम दू चार लाइन एगो अउरी जइसे की
राधे घोरऽ ना अबीर, राधे घोरऽ ना अबीर,
मंड़वा में अइलें कन्हईया।
आ हो राधे घोरऽ ना अबीर, राधे घोरऽ ना अबीर, 
राधे घोरऽ ना अबीर, की मंड़वा में अइलें कन्हईया ।
मंड़वा में अइलें कन्हईया हो मंड़वा में अइलें कन्हईया 
की मंड़वा में अइलें कन्हईया ।
राधे घोरऽ ना अबीर, राधे घोरऽ ना अबीर
मंड़वा में अइलें कन्हईया ।
एह्सब गीत
 के बिच बिच में जोगीरा जब ढोलक के थाप पर कहाला त उमंग जोश आ उत्साह देखल बनेला गाव के छ्वारिक गिरोह आ साथे साथे बारीक़ लोगन के जइसे की ईगो जोगीरा बड़ी मसहूर बाटे हमनी किह्वा
सा रा रा रा रा रा रा रा रा रा रा रा रा
जोगीरा सा रा रा रा
फ़ागुन महिनवा जी सबसे रंगीन हां सबसे रंगीन..
आ याद करे बुढवा जवानी के दिन .. बोलो सा रा रा रा
सा रा रा रा रा रा रा रा रा रा रा रा रा
जोगीरा सा रा रा रा
ओकरा बाद सांझी खानी अबीर के बेर भी गीत गावल जाला जइसे की 
एगो गीत बाटे 
“संउसे सहरिया रंग से भरी,
केकरा माथे ढ़ारूँ अबीर, हो
केकरा माथे ढ़ारूँ अबीर?”
आ फगुवा के अंतिम में चैता उठेला आ ओकरा बाद होली ख़तम लेकिन हर साल इ परब आपसी एकता आ समरसता पर बल देवेला हर साल इ होली के परब समाज में एगो साफ़ सूथरा सन्देश देवे के कोशिश करेला की सब केहू आपन इर्षा, द्वेष अउरी दुश्मनी के भाव के भुला के प्रेम प्यार अउरी समानता के नजरिया अपनावे के चाही। इ परब हमनि के सांस्कृतिक बिरासत हवे जवना के मूल रूप के बचा के अगिलका पीढ़ी तक पहुचावे के जिम्मेदारी हमनी सब केहू के बा ताकि अगिलका आवे वाला पीढ़ी गौरवान्वित महसूस कर सके ….
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लेखक परिचय:-

दिल्ली
ई-मेल:- merichaupal@gmail.com




अंक - 72 (22 मार्च 2016)

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