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सम्पादकीय: अंक - 72 (22 मार्च 2016)


बसंत पंचमी के दिने सम्मत धरइला के संगे फगुआ आपन रंग देखावे शुरू कऽ देला तऽ ओही जा फगुनहटो आपन जोर देखावे लागेला जेवन सम्मत के जरला, रंग से घर के भरला अउरी आखिर में चइता के शुरूआत से खतम होला। एह डेढ महीना में सनातन जीवन दरसन के कइगो तेवहार अउरी परम्परा से होके आदिमी गुजरे ला। माघ शुक्ल पंचमी के बसन्त पंचमी, फागुन शुक्ल चतुर्दशी के सम्मत (होलिका) अउरी फागुन पूर्निमा के फगुआ के रंग शुरू हो के चइता के संगे खतम होला। जाने कब से ई परम्परा चलि आ रहल बा कहल बहुत कठिन बा। ए तेवहारन कऽ सामाजिक महता बहुत जेयादा बा बाकिर बदलत समाज अउरी अर्थशास्त्र एह तेवहारन कऽ रुप अउरी महता दुनू के बदल रहल बा।


बसन्त पंचमी, सम्मत, फगुआ अउरी चइता के महता भुला के आज समाज (शहर होखे भा देहात) खाली देखावा करे में लागल बा। आज बसन्त पंचमी असभ्य गानन पर सभका संगे नाचे, सम्मत पड़ाका फोरे अउरी फगुआ शराब आ कलिया-मछरी खाए के मोका में बदल गइल बा अउरी सभ परम्परा, धरम अउरी तेवहार के नाँव पर कइला जा रहल बा। एह बात से हमरा तनिको असहमति नइखे कि समय के संगे तेवहार अउरी परम्परा आपन रुप अउरी ढंग दूनू बदले ला बाकिर इ बदलाव केवनो नाया परम्परा शुरू ना करेला अउरी जदि केवनो नाया परम्परा शुरू होखत होखे तऽ तेवहारन के परदा कऽ के उनह्नी के महता कम कइला के केवन काम बा? 

आज जरूरी बा कि हमनी के पीढी अउरी नवकी पीढी अपनी परम्परा अउरी पुरखन के विरासत से परिचित रहो अउरी जदि ऊ सभ परम्परा बिगड़ रहल बाड़ी सऽ तऽ उनह्नी के साहित्य के रुप में सोझा ले आवल जाओ। एही मतलब से मैना के ई अंक फगुआ पर आइल बा। उमीद बा पसन परी। 

अंक - 72 (22 मार्च 2016)

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