संपादकीय

फिकिरिया मारे जान - राजीव उपाध्याय

सुगना सूखलें परान।
हो फिकिरिया मारे जान॥

का-का ठीक करे
के-के बतावे ई
देखला पे डूबेला दोकान।
हो फिकिरिया मारे जान॥

जहर-माहूर खाई-खाई
एने-ओने जाला कबो
कबो लगावे ला धियान।
हो फिकिरिया मारे जान॥

केनते जनम कटल
केतना जनम कटी
कबले छूटी खुरपी के सान।
हो फिकिरिया मारे जान॥

सउती के डाह कहऽ
भा परेमी के पियार
छोड़ले ना छुटी एकर निसान।
हो फिकिरिया मारे जान॥
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लेखक परिचय:-

पता: बाराबाँध, बलिया, उत्तर प्रदेश 

लेखन: साहित्य (कविता व कहानी) एवं अर्थशास्त्र 
संपर्कसूत्र: rajeevupadhyay@live.in 
दूरभाष संख्या: 7503628659 
ब्लाग: http://www.swayamshunya.in/
अंक - 66 (9 फरवरी 2016)

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