संपादकीय

आपन आपन जिम्मेदारी - जलज कुमार अनुपम

कहल जाला दुनिया के सबसे आसान काम ह मौजूदा वेवस्था पर अंगुरी उठावल, ओकर आलोचना कइल, ओहमे कमी निकाललI आ ठीक एकरा उल्टा बाटे मौजूदा वेवस्था में रहके ओकर पुनर्निर्माण कइल, ओकरा के सुधारलI कवनो भी समाज में जेतना बुरा लोग होला ओकरा से कही जादा निमन लोग उहवा रहेला बाकिर उचित समय पर जब निमन लोग दमी साध लेवेला त धीरे धीरे बुराई छताए लागेला I दुनिया में जवन सबसे सुनिश्चित काम चाहे चीज बा ओकर नाम मृत्यु बा, जे भी आइल बा ओकरा इ दुनिया एक न एक दिन छोड़ के जाये के बा लेकिन फेरु जानते हुए भी सब केहू एकरा से डरत बा आ कबो कबो इ डर एतना बढ़ जाला की आदमी बुराइ चुप चाप सहे लागेलाI दुनिया में मौजूद हर धर्म से बढ़के एगो स्वधर्म होला जवन बतावेला की कवनो भी विकट परिस्थिति में खुद से संज्ञान लेके आदमी के का करे के चाही, कुछ चीजन पर इन्सांन के बस ना चलेला ओकरा के प्रकृति अपना हिसाब से चलावेले, लेकिन जेकरा में इ लौकत होखे की ना इ चीज बेजाय होत बाटे ओकर इ फर्ज बनत बाटे की उ गलत हो रहल चीजन के खिलाफ आवाज उठाओI
हर आदमी अगर अपना आप के अपना घर में, समाज में, चाहे जहवा ओकरा लउके इहवा हमरा अच्छाई के ठीकेदारी लेवे के पड़ी उहवा आगे आ के अच्छाई के वाहक बने के कोशिश करे के चाहीI खाली सरकार के भरोसे, मौजूदा तंत्र के भरोसेउमीद कईल की बदलाव होई इ गलत बाI सही मायने में बदलाव तब आई सब केहू आपन आपन जिम्मेदारी निभाई, जब सभे केहू के आपन आपन जिम्मेदारी के एहसास होखे लागीI अगर सोच के देखल जाव त कवनो भी सरकारी तंत्र के ख़राब होखे में भी समाज के ही कही न कही हाथ होला, समाज जब जब अपना जिम्मेदारी के भागे लागल बा, तब तब समाज में बुराई पनपल बाI भारत के आज़ादी त मिल गईल लेकिन बहुत अनसुलझा सवाल आजुओ मौजूद बाI भारत कहे के लोकतंत्र ह लेकिन एह लोकतंत्र में आज ले ताकत लोक में ना आईल ताकत त बस तंत्र तक ही सिमित रह गईल आ उ तंत्र त लोक के पहुच से बहुत दूर बा आजो आ पता ना कब ले रही? सरकार पर सरकार बदलल, चेहरा पर चेहरा बदलल लेकिन उ कुर्सी ना बदलल, कहे खातिर कुर्सी सरकार के जनता तय करेले लेकिन जनता तय कईला के बाद उ कुर्सी से बहुत दूर हो जाले आखिर काहे ..?
आजू देख के बड़ी अजीब लागेला की भारत में आम जन में भी हमार तिरंगा झंडा ऊचा रहे इ सोच खाली १५ अगस्त भा २६ जनवरी के दिने आवेला आ ओकरा बाद पता न खा गाएब हो जालाI जब ले देश बा तबे के सब केहू बा जब देश ना रही त उहवा के लोगन के भी अस्तित्व पर संकट के बदल मडराए लागीI एह से इ सब केहू के नैतिक जिम्मेदारी बनत बा की अपना स्तर से हर मोड़ पर आगे आ के देश के आगे ले जाये के दिशा पर काम करेके, समाज से द्वेषपूर्ण भावना के तज के समरस गंगा भावे के प्रयास करे के चाहीI काहे की हमनी के प्रयाश से ही हमनी के झंडा हरदम ऊचा रह सकेला आ झंडा अपना देश के ऊचा राखे के जिम्मेदारी सब केहू पर बा आ सब केहू के अब आगे आवे के चाही आपन आपन समाज के अपना स्तर पर उपर ले के जाए के हर संभव कोशीस करे के चाहीI
देश सबकर ह आ संविधान के दायरा में रह के सब के आपन उचित दायित्व के निर्वहन करिके देश से उरीन होखे के कोशिश करे के चाहीI
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लेखक परिचय:-

दिल्ली
ई-मेल:- merichaupal@gmail.com



अंक - 67 (16 फरवरी 2016)

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