संपादकीय

चुनावी चपलूस - अभिषेक यादव

देखीलऽ अधिकई बतियावल 
खदेड़ना के नाती के, 
आठ गोल के पुड़ी उड़वलस 
कल-परसो आ राति के। 

जेतने भीरी, ओतने फिरी 
नेत-धरम हऽ पार्टी के, 
नेताकट पहिरावल जाता 
के पूँछता गांती के? 

बाबा खदेड़न कहिके गईले 
ओकरा इहां काटि के? 
जे भी भोटर अनकुसाले 
जमके पिटऽ उलाटी के। 

मुर्गा जिंदा, दारू आबाद 
उखमजई बाराती के, 
अनखाती के रगड़ल देखऽ 
मुरचा छुटे पाराती के। 

हैंडपंप करजोरि लगेला 
जनसेवा खैराती के, 
भीतरे-भीतर फफनऽतारे 
हमरे से आटी के? 

बनिहारी से ठीक भेंटाता 
पर्ची-पर्चा साटि के, 
तीन गुना से जादा खर्ची 
खाईल-पियल काटी के। 

छछुनर के सिरोमौर बा 
चमेली तेल चांती के, 
गुटबंदी बा अईसन-अईसन 
अब भुवरा के डाँटी के? 

हमरो तब जुगाड़ लगा द 
हाथ-गोड़-मुँह चाटि के, 
हमहूँ चलके देखिऐ लीं 
ऊ छप्पन इंच के छाती के।
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अंक - 49 (13 अक्टूबर 2015)

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