संपादकीय

कवने खोतवा में लुक‍इलू - भोलानाथ गहमरी

कवने खोतवा में लुक‍इलू आहि रे बालम चिरई।
आहि रे बालम चिरई, आहि रे बालम चिरई।

बन-बन ढुँढली दर-दर ढुँढली ढुँढली नदी के तीरे
सांझ के ढुँढली रात के ढुँढली ढुँढली होत फजीरे
जन में ढुँढली मन में ढुँढली ढुँढली बीच बजारे
हिया-हिया में प‍इसि के ढुँढली ढुँढली विरह के मारे
कवने अँतरे में सम‍इलू आहि रे बालम चिरई
कवने खोतवा में लुक‍इलू आहि रे बालम चिरई।

गीत के हम हर कड़ी से पुछलीं पुछलीं राग मिलन से
छंद-छंद लय ताल से पुछलीं पुछलीं सुर के मन से
किरन-किरन से जाके पुछलीं पुछलीं नल गगन से
धरती और पाताल से पुछलीं पुछलीं मस्त पवन से
कवने सुगना पर लोभ‍इलू आहि रे बालम चिरई
कवने खोतवा में लुक‍इलू आहि रे बालम चिरई।

मंदिर से मस्जिद तक देखलीं, गिरिजा से गुरुद्वारा
गीता और कुरान में देखलीं, देखलीं तीरथ सारा
पंडित से मुल्ल तक देखलीं, देखली घरे कसाई
सगरी उमिरिया छछलत जियरा, कैसे तोहके पाईं
कवने बतिया पर कोहँइलू, आहि रे बालम चिरई
कवने खोतवा में लुक‍इलू आहि रे बालम चिरई।
----------भोलानाथ गहमरी

अंक - 48 (29 सितम्बर 2015)

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