विविध

भोजपुरी लोकगीत में नारी - केशव मोहन पाण्डेय

भारतीय संस्कृति में हर प्रकार से विविधता देखल जा सकल जाला। ई विविधता भोजपुरी की गहना बन जाले। एगो अलगे पहचान बन जाले। इहे विविधते त अपना भोजपुरी संस्कृति के विशिष्टता देला आ अलग पहचान बनावेला। एह संस्कृति आ पहचान के कवनो बनल-बनावल निश्चित ढ़ाँचा में नइखे गढ़ल जा सकत। ई त बलखात अल्हड़ नदी जइसन कवनो बान्हो से नइखे घेरा सकत। ई त ओह वसंती हवा जइसन बावली, मस्तमौला आ स्वतंत्र ह, जवना पर केहू के जोर ना चलेला। अपने मन के मालीक। एह के कवनो दिशा-निर्देश के माने-मतलब पता नइखे। एह संस्कृति के केहू गुरू नइखे आ ना एह के कवनो बात के गुरूरे बा। ई त बस जन-मानस के अंतस से निकलल एकदम निरइठ आ पावन मानसिकता आ भावुक-सरस सोच को देखवेवाला हमनी के पहिचान ह। हमनी के त अपना सांस्कृतिक समृद्धि आ उपलब्धियन पर मुग्ध हो के खाली वाहवाही ना देनी जा, एकरा सथवे जीवन-जगत से ओकरा संबंध के आ अउरीओ तमाम सांस्कृतिक घटकन के आपस के संबंध के मन से जोड़बो करेनी जा। हमनी के समझबो करेनी जा। भोजपुरी संस्कृति में संबंधन के दायरा खाली अपना कुनबा आ आसे-पड़ोस ले ना होला, दोसरो गाँव के लोग ‘फलाना’ काका, चिलाना चाचा, भाई आदि कहाला लोग। 

पछीम के देषन में लिखित साहित्य के परंपरा रहल बा। ओहिजा बोलचारू साहित्य के परंपरा ना के बराबर बा। ओने के चिंतन आ अध्ययन लिखित दस्तावेज़ आ सबूत के आधार बनाके कइल जाला, जवना एकदम उचिते बा। प्रमाण से प्रमाणिकता सिद्ध होला। एकरा ठीक उल्टा अफ्रीका में वाचिक परंपरा भरपूर रहल बा, एकदमे समृद्ध, बाकीर ओहिजा लिखित परंपरा हइए नइखे। ओहिजा के अध्ययन खातीर मौखिक स्रोतन के सहारा लिहल ही उचित होई। भारत में लिखित आ लोक-संस्कृति के मौखिक परंपरा लगभग एक्के बराबर सशक्त आ समृद्ध रहल बा। एहिजा के पारिस्थितिक आ तार्किक दूनो संरचना के बीच स्पष्ट रूप से कवनो बँटवारा के लाइन तय नइखे कइल जा सकत। कुछ चीज अइसन अरूर बा जवना के पूरा-पूरा लोक चाहें शिष्ट परंपरा में रखल जा सकल जाता, बाकीर एह दूनों के बीच में ढेर चीज अइसन बा जवना के दूनों में से कवनो एक में ना राखल असंभव बा। हमनी के इहो इयाद राखे के चाहीं कि जवना चीज के आज निस्संकोच रूप से शिष्ट चाहे लिखित परंपरा में राखल जा सकल जाता, ऊ सब कबो कभी वाचिक परंपरा में रहल बा। 
भारत के परिप्रेक्ष्य में देखल जाय त लोक आ लिखित परंपरा में रामायण-महाभारत के सैकड़ों रूप बा। लोक आ शास्त्र के गुणात्मक योग से फलित भक्ति साहित्य त एगो नया त्रिकोणे रच दिहलस। अगर लोक आ शास्त्रने के केंद्र मानल जाव त ई कुल रचना एह दूनो केंद्रन के बीच एह ढंग से स्थित बा कि लोक-मर्मज्ञ एहके लोक-परंपरा के ज्ञान अउरी साहित्य के लिखित रूप करार देंला लोग आ शास्त्र-ज्ञानी एही रचनन के शास्त्रीय ज्ञान अउरी शिष्ट साहित्य के लोकोपयोगी संस्करण कही लोग। मनुष्य त सामाजिक प्राणी ह, बाकीर आदमी के सगरो सपना, सगरो इच्छा समाज आ इतिहास में पूरा ना होला। आदमी के सपना आ ओकर इच्छा समाज अउरी इतिहास से प्रभावित त होला, बाकीर समाज अउरी इतिहास से बान्हाइल ना रहेला। एही से त आदमी ‘स्वप्न लोक स्रष्टा’ ह। इतिहास के कवनो काल-खंड होखे चाहे समाज में फइलल कवनो विचारधारा, स्त्री-पुरुष, नर-मादा, मरद-मेहरारु में भेदभाव साफ-साफ लउकेला। जहवाँ पुरुष अपना सपना पर नगर, महल, स्मारक आ नया-नया राजवंशन के उदय करत रहल बा, ऊहवें औरतन के सपना आ इच्छा लोकगीतन में दर्ज होत रहल बा। एक अर्थ से लोक-साहित्य अउरी समृद्ध भइला के साथे-साथ प्राचीनो भइला पर ई नया चिंतन के केंद्र बन जाला।  
हम अपना बाप-महतारी के सबसे छोटका संतान हँई, जवना कारने ओह लोग से हमार सन्निकटता उनका प्रौढ़ा अवस्था से उनका वृद्धा अवस्था ले बनल रहल। हम कई बेर अनुभव करीं कि माई जब कवनो विषम परिस्थिति में पड़ जाव तब गीत गावे लागें। ओह बेरा माई के गीत खाली गीत ना हो के उनका अंतर के पीड़ा होखे। हमके साफ-साफ ईयाद बा कि ऊ गीत गावत कम, गीत रोअत अधिका लागें। कवनो विषम-परिस्थिति में ऊ अपना के द्रौपदी लेखा प्रस्तुत करत गावे लागें -
अब पति राखीं ना हमारी जी, 
मुरली वाले घनश्याम।।
बीच सभा में द्रोपदी पुकारे
चारू ओरिया रउरे के निहारे
दुष्ट दुशासन खींचत बाड़ें
देहिंया पर के साड़ी जी, 
मुरली वाले घनश्याम।।
जब माई हमरा के सुतइहन तब लगभग हमेशा गीत गइहें। उनका गीतीया के बोलवे से हमरा लइका मन के बुझा जाव कि उनका मन में एह बेरा हर्ष-उल्लास, पीड़ा-वेदना, ममता-दुलार आदि कवना भाव के अधिकता बा। जब ऊ सहज रहिहें तब आपन सबसे प्रिय गीत जवना में सिंगारों रहे, प्रेमों रहे, ऊहे गीत गइहें -
अजब राउर झाँकी ये रघुनन्दन।।
हिरफिर-हिरफिर रउरे के निहारे
रउरे ओरिया ताकी ये रघुनन्दन। 
अजब राउर झाँकी ये रघुनन्दन।।
मोर मुकुट, मकराकृत कुण्डल
पैजनिया बाजे बाँकी ये रघुनन्दन।
अजब राउर झाँकी ये रघुनन्दन।।
हमरा त लोकगीत आ लोक-साहित्य के समृद्धि में सबसे अधिक औरतने के योगदान बुझाला। उदाहरण के रूप में हम अपना माई के ईयाद क के कहीं त कवनो परब-त्योहार के बेरा जब भैया लोग घरे ना पहुँचे लोग चाहें आवे में देरी हो जाव त हमार माई पूरा के पूरा कौशल्या बन जासु। ऊ कौशल्या, जेकरा राम लोग के समय रूपी कैकेयी वन में भेज देहले बिया। ओह बेरा त माई गावते-गावते इतना रोअस कि अवजवे बइठ जाव, - 
केकई बड़ा कठिन तूँ कइलू 
राम के बनवा भेजलू ना। 
हो हमरो केवल हो करेजवा 
तुहू काढियो लेहलू ना। 
हमरा राम हो लखन के 
तुहू बनवा भेजलू ना। 
हमरा सीतली हो पतोहिया 
के तूँ बनवा भेजलू ना। 
केकई बड़ा कठिन तूँ कइलू 
राम के बनवा भेजलू ना।।
ओह बेरा हमहूँ उनका से छुप के उनका दर्द भरल गीतन के सुनीं आ पलक से टपके खातीर तइयार भइल लोर के पोंछ के कतहूँ दूर हट जाईं। लोकगीतन के बेर-बेर सुनके आ ओहमें आइल मुद्दन पर उनकर सोच आ संवेदना के त ना, बाकीर अपना माई के एगो केंद्र मानके बहुत कुछ समझले बानी। हमरा पूरा विश्वास बा कि लोकगीतन के मरम समझे वाला हर आदमी अइसने अनुभव से गुजरत होई। औरतन द्वारा गावे वाला लोकगीतन के स्वभाव ह कि ओहमें बहुते बड़को बात अक्सर कवनो साधारण घटना-प्रसंग के जरिए, बाकीर अनुभूति के गहनता से कहल जाला। गीतन के अंत में एकाध गो अइसन पंक्ति आ जाला, जवना से पहिले के साधारण घटना-प्रसंगों असाधारण रूप से महत्वपूर्ण बन जाला। लोकगीतन में जीवन-जगत के बड़का-बड़का तथ्य वस्तुनिष्ठ सहसंबंधन के बहाना से कहल जाला। आज के औपनिवेशिक आधुनिकता के पहिले सृष्टि आ समाज त का, परिवार के भारतो के अवधारणा खाली मनुष्य पर केंद्रित नइखे रहि गइल। ओह बेरा त आदमी के भौतिक सुख-समृद्धि खातीर खाँची भर प्राकृतिक उपादानन के बेहिसाब दोहनो के परंपरा नइखे, बाकीर प्रकृति के अवयवन के साथे प्यार, पारस्परिकता आ सहनिर्भरता के जीवन जीए पर जोर रहल बा। एही कारने त अपना किहा गंगा मइया बाड़ी, विन्हाचल देवी बाड़ी आ लगभग सब जाति-प्रजातिअन के पेड़न पर कवनो ना कवनो देवता के वास आ घर-दुआर मानल जाला। 
भले केहू हिम्मत क के दिल खोल के आ जबान के ताला तुर के स्वीकार ना करे, बाकीर आजुओ ढेर लोग बा कि जब घर में बेटी के जनम होला त ओह लोग के लागेला कि जिनगी में अन्हार हो गइल। महतारी बनल औरत अपनही के कोसे लागेले कि अगर ऊ जनती कि बेटी होई त कवनो जतन क के ओह मासूम के कोखिए में मार देती। बेटी के जनम के खबर पा के बाप मुँह लटकवले, मुरझाइल घूमे लागेले। ई सब औरतन के गीतियन में देखे के मिलेला - 
जब मोरे बेटी हो लीहलीं जनमवाँ
अरे चारों ओरियाँ घेरले अन्हार रे ललनवाँ
सासु ननद घरे दीयनो ना जरे
अरे आपन प्रभु चलें मुरुझाइ रे ललनवाँ।
अब पूरा के पूरा ई बुझाए बनेला कि समाज में बेटी के जनम से दुखी भइला पर, एह के खराब माने के आदत के एगो सीमा से अधिका बढ़े से रोके खातीर ओही समजवा के भीतरीये एगो लोक-विश्वास उभरेला। लोग के बुझइबे ना करे ला कि बेटी जनमला पर बाप-महतारी चाहे कुल-खानदान के लोग के लोग दुखी काहें होलें? चिंता काहें करेंले? एहके बिना जनले एह मुद्दा से कवनो लेखां न्याय नइखे हो सकत। ई चरचा आगे कइल जाई, जब एह कारन के साफ करे वाला परिस्थिति साफ हो जाई। वेटी के जनमला पर ओकरा के मारे के कोशिश चाहें अभिलाषा कवनो गीतन में ना मिलेला। जनमला के बाद बेटियो माई के कोख से जनमल, ओकरे खून-दूध से सीरजल आ पैदा भइल एगो संतान होले। ऊहो एगो बेटे जइसन अपना बाल-लीला से बाप-महतारी के करेजा जुड़इबे करेले। ओकरा प्यार-दुलार में बाप-महतारी जीवन की सगरो पीड़ा, भले तनीए देर खारीरा, भुला जाले। 
ई सब भारतीय परंपरा से मान्यता प्राप्त संवेदना आ भावना हवे। आधुनिकता के अइला के साथही एगो आदर्श भारतीय परिवार के आदर्श स्त्री बनावे के अभियान के साथ ही संवेदना आ भावना घटल बा। भावना स्त्री बनवला के, भावना लोक-गीतन के। समय के साथे चले के होड़ लगावत आज के आदमी तर्क चाहे कुछू कहे बाकीर लोक-जीवन, लोक-साहित्य आ लोक गीतन के स्वरूप त विकसिते भइल बा। समृद्धे भइल बा। लोक-गीत आ लोक-अस्तित्व आधुनिक तार्किक सोच के परिणाम ना ह। एकरा के त बरीसन पहिले परिभाषित आ पोषित कइल गइल बा। ऋग्वेद के सुप्रसिद्ध पुरुष सूक्त में ‘लोक’ शब्द के व्यवहार जीवन आ जगह दूनों के अर्थ में कइल गइल बा। -
नाभ्या आसीदंतरिक्षं शीष्र्णो द्यौः समवर्तत्।
पद्भ्यां भूमिर्दि्दशः श्रोत्रात्तथा लोकां अकल्पयन्।।
एह तरे के अनगिनत उदाहरणन से साफ हो जाता कि सामान्य जीवन आ स्थान से जुड़ले संगीत के लोक-संगीत कहल जाला। लगभग सब भाषा आ बोलियन के अधिकांश लोक-संगीत लिखित कम, मौखिक ढेर बा। गायन के विरासत के रूप में लोक-संगीत कई पीढ़ी से आवत जन-जीवन के दर्पण होला। जनता के हृदय के उद्गार होला। 
गँव-जवार के लोग संस्कार, ऋतु, पूजा-व्रत, अउरी दोसर कार्यकलापन आदि के अवसर पर जब अपना मन के भावना के उद्गाार गा के करे ला लोग त अइसही लोक-संगीत के सृजन हो जाला। लोक-संगीत सभ्यता, संस्कार आ समाज के समृद्ध करे के साथे-साथे बोली, भाषा आ भावो के एगो अलगे पहचान देबे में सक्षम होले। भोजपुरी लोक-संगीत के त अपना सरसता, मादकता, समृद्धि, उन्माद, अपनापन, ठेंठपन आदि के कारने सबसे समृद्ध कहल जा सकल जाता। जन-जन में अपना प्रचुरता, व्यापकता आ पइठ के कारने भोजपुरी लोक-संगीत के प्रधानता स्वाभाविक बा। 
मजूरी कई के 
हम मजूरी कई के 
जी हजूरी कई के 
अपने सइयाँ केऽऽ 
अपने बलमा के पढ़ाइब
मजूरी कई के।।
भोजपुरी पुरूब के बोली ह। पुरूब! जहवाँ के माटी सदानीरा नदियन के तरंगन आ रस से हमेशा आप्लावित रहेले। जब मटिए सरस होई त संगीत के सुर में निरसता कहाँ समाई? जब सरसता, मादकता, सुन्दरता, प्रेम, ममता, समर्पण, परिश्रम, जीवटता, जीवन आदि के बात आई त जीवन देवे वाली, जीवन भोगे वाली आ जीवन बनावे वाली नारी के तरे बँच जाई? --- नारी त जीवन के आधार होले। लोक-संस्कृति, लोक-संस्कार, लोक-जीवन नारीए से जीअ ता, त लोक-संगीत ओह देवी के बिना के तरे हो सकेला?
कुछ साल पहिले के बात ह, हम अपना शहर में हमेशा सिनेमा देखे जाईं। एगो चित्र मंदिर में त लाम-नियर एक बरीस से सिनेमा शुरू भइला के पहिलवाँ एगो विज्ञापन हमेशा देखावल जाव। हम ओह विज्ञापनवा के देख-देख के अकुता गइल रहनी बाकीर ओकरा शब्दन में डूब गइल रहनी। वाॅयस-ओवर के एकहक शब्दवा हमरा भेजा में चित्र बनावे लागे। ‘नारी! प्रकृति की अनुपम कृति। प्रेम और सौंदर्य की प्रतिमूर्ति! --- ममता और स्नेह का साकार रूप।’ 
तब जयशंकर प्रसाद जी के लाइन जीभ पर जुगाली करे लागे - 
नारी तुम केवल श्रद्धा हो,
विश्वास रजत नग-पद-तल में।
पियुष-स्रोत सी बहा करो
जीवन के सुन्दर समतल में।।
नारी चर्चा के बिना कवनो देश, समाज आ वातावरण के लोक-संगीत के जीरो आ खार कहल जा सकल जाता। भोजपुरियो-संगीत में नारी के अनगिनत रूपन के चर्चा का बरनन देखल जाला। भोजपुरी के सिंगार, करुणा, वीर, हास्य, निरगुण संगीत होखे चाहें आजु काल्ह के फिल्मी ठुमका, सगरो झाँझ, पखावज, हारमोनियम, बैंजू, गिटार नारीए के आगे-पाछे अपना सुर के साधना करत लउके ले। सोहर में नारी के एगो रूप देखीं -
मचीया बइठल मोरे सास
सगरी गुन आगर हेऽ।
ए बहुअर, ऊठऽ नाही पनीया के जावहु
चुचुहीया एक बोलेलेऽ हेऽ।।
भोजपुरी लोक-संगीत में बरनन चाहे ऋतुअन के होखे, चाहे ब्रत के, चाहें देवी-देवता के, चाहें संस्कार के, जातियन के होखे चाहें मेहनत-मजुरी के, हर संगीत में नारी के सगरो रूप को पावल जा सकता। भोजपुरी लोक-संगीत आल्हा भले वीर रस से सराबोर रहेला त का ह, नारी विवशता, अधिकार, सुन्दरता आ समर्पन के बहाने लउकीए जाले, - 
जाकी बिटिया सुन्दर देखी, ता पर जाई धरे तरवार।।
या
चार मुलुकवा खोजि अइलो कतहु ना जोड़ी मिले बार-कुँआर
कनिया जामल नैनागढ़ में राजा इन्दरमल के दरबार
बेटी सयानी सम देवा के बर माँगल बाघ झज्जार
बडि़ लालसा बा जियरा में जो भैया के करों बियाह
करों बिअहवा सोनवा सेऽ -----।।
फगुआ आ चइता के शब्द त जइसे नारीण् से जनमल बा, -
गोरी भेजे बयनवा हो रामा
अँचरा से ढाकि-ढाकि के।।
सावन के हरिहरी में सगरो भोजपुरिया धरती लहलहात रहेले, तब कवनो नवही मेहरारू अपना सुहाग से दूर ना रहे के चाहे ले। कजरी के गीतन में नारी के प्रेयसी स्वरूप के देख के केवर मन ना द्रवित होई, -
भइया मोर अइलें बोलावे होऽ
सवनवा में ना जइबें ननदी।
चहें भइया रहें चाहें जाएँ होऽ
स्वनवा में ना जइबें ननदी।।
भोजपुरी-क्षेत्र में मनावे वाला सगरो ब्रत-त्योहारन में नारी के पावन रूप के बरनन अपने आपे लउक जाला। व्रत-त्योहार त वइसही स्त्री के निष्ठा के प्रतीक ह। त फेरू ओहसे नारी अलगा के तरे हो सकेले? भोजपुरी माटी के सबसे पावन व्रत छठ में करुणा से सनाइल, छठ माता के आशीष पावे के आग्रही एगो नारी के चित्रण देखीं, -
पटुका पसारि भीखि माँगेली बालकवा के माई
हमके बालकऽ भीखि दींहि, ए छठी मइया
हमके बालकऽ भीखि दींहि।
निर्गुण में त नारीए आत्मा बन जाले। ऊहे वाचको रहे ले, ऊहे याचको रहेले। दाता और भिखारी, सब नारीए रहेले, -
जबसे गवनवा के दिनवा धराइल
अँखिया ना नींद आवे 
देंह पीअराइल।।
हम कह सके नी कि नारी चइता के बिरह ह। ऊ लोरी के थाप ह। नारी निरगुन के सब छंद ह। ऊ कँहरवा के कलपत पीड़ा ह। पचरा के झूमत भक्तिन ह। आल्हा के मर्दानी अवतार ह। नारी फगुआ के मांसल मतवना ह। छठ के समर्पित सुशीलता ह। ऊहे विदाई की लोर ह। सोहर के सद्यः-प्रसूता माई ह। बिरहा के अलाप ह। झूमर के भाव व्यंजना ह। जँतसार के ध्वनि पर नाचत रगवो नारीए ह। नारी बारहमासा के वर्णन ह। निर्धनता के आह नारीए व्यक्त करे ले। रिश्तन के सगरो डोर नारीए सम्हारे ले। भोजपुरी के कवनो लोक-संगीत के बात कइल जाव, नारीए के रूप पहीले झलकेला। ननद-भौजाई के टिभोली होखे चाहें सास के शासन, देवर के छेड़छाड़ होखे, चाहे जेठ के बदमाशी, नारी के खाली उपस्थितिए से लोक-संगीत में इनकर बरनन संभव होखे ला। 
कुँआर लड़की भाई के शुभ के खातीर कातिक में पिडि़या के व्रत रहेली सों त महतारी लोग अपना पूत के रक्षा खातीर जिउतिया। मेहरारू अपना सुहाग के रक्षा खातीर तीज व्रत रहली सों त एही तरे औरतन में बहुरा आ पनढरकउवा जइसनका ढेर व्रत-त्योहार देखल जाला। नारीए के माध्यम से भोजपुरी लोक-संगीत में जन-जीवन के आर्थिको पक्ष के झाँकी प्रस्तुत हो जाला। देखीं ना, -
सोने के थाली में जेवना परोसलों,
जेवना ना जेवें अलबेला,
बलम कलकत्ता निकल गयो जीऽऽ।
भोजपुरी लोक साहित्य में नारी के जवन चित्रण कइल गइल बा, ऊ मांसल, मादक आ आकर्षक भइला के साथे-साथे रसदार, शिष्ट आ सभ्यो बा। पति-पत्नी, भाई-बहीन, माई-बेटी, ननद-भौजाई, सास-पतो हके जवन बरनन हमनी के सामने मिलेला, ओह से समाज में नारी के अनगिनत चित्र अंकित हो जाला। नारी के जवना रूप के शुद्ध आ सत्य बरनन भोजपुरी लोग-संगीत में पावल जाला, ऊ दोसरा जगे दुर्लभ बा। 
समय के साथे बदलाव के बयार के गंध सभे सूँघता। भोजपुरी के लोक-संगीतो ओह से अछुत नइखे। व्यावसायिकता आ बाजारू संस्कृति लोक-संगीत के कुछ रंगीन क देहले बा। भोजपुरीओ लोक-संगीत पर आधुनिकीकरण के मुलम्मा चढ़ाके बाजार में परोसल जाता। मांसलता के वर्चस्व के साथही रसदार रूपो के बिसारल जाता। भोजपुरी जइसन गंभीर आ समृद्ध भाषा के दूषित कइल जाता। भोजपुरी भाषा, भाव आ संगीतो में रोज नया-नया जीए-खाए आ दू पइसा कमाए के अवसरो सृजित कइल जाता। नारी के अनेक रूपन के बरनने से भोजपुरी के लोक-संगीत के अतीत त समृद्धे बा, वर्तमानो में रोजगार के अवसर उपलब्ध हो ता। एह आधार पर कहल जा सकता कि अगर अपना जबान आ कलम पर संयम रहल त आवे वाला आपनो काल्हू बड़ा उजर बा। ई त सचहूँ कहल गइल बा कि हर सफलता के पाछे एगो नारीए के हाथ रहेला। एकरा के मानला के साथही स्वीकारो करे के क्षमता राखे के पड़ी। नारीए से त ई सृष्टि बा।
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लेखक परिचय:-

2002 से एगो साहित्यिक संस्था ‘संवाद’ के संचालन।
अनेक पत्र-पत्रिकन में तीन सौ से अधिका लेख, दर्जनो कहानी, आ अनेके कविता प्रकाशित।
नाटक लेखन आ प्रस्तुति।
भोजपुरी कहानी-संग्रह 'कठकरेज' प्रकाशित। 
आकाशवाणी गोरखपुर से कईगो कहानियन के प्रसारण, टेली फिल्म औलाद समेत भोजपुरी फिलिम ‘कब आई डोलिया कहार’ के लेखन अनेके अलबमन ला हिंदी, भोजपुरी गीत रचना. 
साल 2002 से दिल्ली में शिक्षण आ स्वतंत्र लेखन.
संपर्क –
पता- तमकुही रोड, सेवरही, कुशीनगर, उ. प्र.
kmpandey76@gmail.com

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