संपादकीय

भीखा साहब (जीवन चरित)

भोजपुरी साहित्य के विकास के क्रम में एक से बढि के एक संतन के जोगदान बा। ओही परम्परा आगे बढावले बानी भीखा साहब जी। इंहा कऽ भोजपुरी कऽ कबी रहनी औरी बावरी पंथ कऽ भुरकुड़ा, गाजीपुर शाखा कऽ नौवाँ संत रहलीं जिंहा के गुरू के नाँव गुलाल साहब रहल। बावरी पंथ निरगुन साधना कऽ एगो पाँच सौ साल पुरान परम्परा हऽ जेवना के अनुयायी पूरबी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर और बलिया जिला में पावल जालें। इँहा का एगो बरियार संत रहनी जे देखावे-सुनावे फेरा में रहे वाला रहनी। उँहा के ए बात माने वाला रहनी कि जे भगवान के भजन ना करेला ऊ कालरुप होला-

“भीखा जेहि तन राम भजन नहिं कालरूप तेहि मानी।” जिन

जिनगी क जतरा 

भीखा साहब जी कऽ जनम आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) जिला क खानपुर बोहना गाँव में विक्रमी संवत 1770 में एगो चौबे ब्राह्मण परिवार में भईल रहे। इंहा के माई (माता) एगो घरहू मेहरारु (गृहणी) औरी बाबूजी (पिता) पूजा-पाठ करावे वाला एगो पंडी जी रहनी। बचपन में माई-बाबूजी इँहा के नाँव भीखानंद चौबे रखनी। जनेव (उपनयन संस्कार) भईला के बाद इँहा के पाठशाला में घर के रेवाज नियर कुछ समय खाती पढाई भईल। लेकिन इँहा के मन घरबारी पढाई-लिखाई औरी काम-काज में लागे। मन के थाह ना लागत रहे लेकिन साधु-संतन के सेवा औरी संगत नीक लागे। उमिर बढला के सङगे-सङगे इँहा के मन धीरे-धीरे सधुआई की ओर जाए लागल। ई देखि के माई-बाबूजी बारह बरिस के उमिर इँहा के बियाह ठान दिहनी लेकिन भीखानन्द के मन घरई बियाह में ना रहे। ऊ तऽ उपर वाला से बियाह करे खाती बेचैन रहे। भीखानंद के ई घरई बियाह फसरी नियर लागल औरी ऊ चुपचाप घर-दुआर छोड़ि के काशी चलि दिहलें। 
कहल जाला कि काशी मंदिर-मंदिर औरी घाट-घाट जाके अपना भीतर लौ खाती बाती खोजे लगलें लेकिन काशी में जेवना चीझ खाती आईल रहलें ना मिलल। मन काशी दे उचटि गईल औरी ऊ एनो-ओने भूलाए-भटके लगलें। भूलात-भटकत ऊ गाजीपुर जिला कऽ सैदपुर भीतरी परगना के अमुआरा गाँव पहुँचलें। ओही गाँव में “कहे गुलाल” गुलाल साहब क एगो पद लोगन गावत सुनलन। ई पद भीखानन्द के भीतर समा गईल औरी ऊ सीधे भरकुड़ा जा के गुलाल साहब चेला ‘भीखा साहब’ हो गईलें। कहल जाला कि गुलाल साहब के देखि के भीखानंद एकदम शान्त हो गईलें औरी उनकरा अईसन लागल कि उनकर सगरी भाग-दौड़ खतम हो गईल औरी उनकरी के रसता मिल गईल। खुदे अपनी सबद में कहलें बाड़ें –
“बीत बारह बरस उपजी रामनाम सों प्रीति।
निपट लागी चटपटी मानों चरिउ पन गये बीति॥”
भीखा के मन में रामनाम कऽ अईसन परेम जागल कि उनकरा ई लागे लागल कि बारह बरिस में ही चारो पन बीत गईल होखे औरी उनकरी सोझा मउत खड़ा बे। ए तरे भीखा गुलाल के हो गईलें औरी गुलाल भीखा के।
भीखा साहब गुलाल साहब से दीक्षा ले के साधना करे लगलीं औरी उँहा के अपना साधना में एतना गहीराई ले अईली की गुलाल साहब के मरला के बाद भीखा साहब गद्दी पर बईठनी। उँहा के साधना के गहीराई ए पंक्ति से मिलत बा -
‘इत उत की अब आसा तजिकै, मिली रहु आतमराम’
एने-ओने के आसरा के छोड़ि के अपना भीतर झाँकला पर भगवान मिलहें; कहीं और से ना। ठीक ओही तरे एहू पंक्ति मे कहे बाड़े-
‘भीखा दीन कहां लगि बरनै, धन्य घरी वह जाम’
ओ घरी के के तरे बात बताईं जब केहू अपना भीतर डूबि के भगवान के खोज लेला।
भीखा साहब के दू गो चेला भईल लो; गोविन्द साहब औरी चतुर्भुजदास। गोविन्द साहब फैजाबाद में आपन गद्दी चलवलें औरी चतुर्भुजदास भुरकुड़ा में रहि के भीखा साहब के परम्परा के आगे बढ़वलें। भीखा साहब विक्रमी संवत 1820 में दुनिया छोड़ि के परम धाम चलि गईलें। उँहा के पीछे चतुर्भुजदास गद्दी पर बईठलें। 
भुरकुड़ा में भीखा साहब, गुलाल साहब औरी बुल्ला साहब कऽ समाधि आजो बे औरी विजयदशमी पर मेला लागेला। आजो भीखा साहब के कुछ चेला भुरकुड़ा औरी बलिया बड़ागाँव में बाड़े लेकिन अब भीखा साहब के बावरी परम्परा लगभग खतम होखे के हाल में आ गईल बे।

साहित्यिक जतरा 

भीखा साहब के छौ गो रचना बाड़ी सऽ - 
  1. राम कुण्डलिया
  2. राम सहस्रनाम
  3. रामसबद
  4. रामराग
  5. राम कवित्त
  6. भगतवच्छावली
उँहा के सगरी रचना भोजपुरी में बाड़ी सऽ जेवना में भगवान से परेम देखावल गईल बा। सङही दुनिया कऽ असारता, मन के भावन के बात उँहा के छंदन के हिस्सा बा।

संदर्भ सूची


  • भीखा साहब की बानी और जीवन चरित्र, बेल्वेडियर स्टीम प्रिंटिग वर्क्स, इलाहाबाद 1919
  • वर्मा, डा रामकुमार, 2007, हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली पृष्ठ संख्या 273
  • शर्मा, लीलाधार, 2009, भारतीय चरित कोश, राजपाल एण्ड संस पृष्ठ संख्या 573-574
  • अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ रचनावली -2, वाणी प्रकाशन, 2010
  • सिन्हा, रवींद्र कुमार, 1994, संत काव्य की सामाजिक प्रासंगिकता, वाणी प्रकाशन
  • ओशो, रजनीश, 1979, गुरु प्रता साध की संगत, प्रवचन-1, दिनांक-11मई 1979, रजनीश आश्रम पूना
  • वर्मा, डॉ. धीरेंद्र, हिन्दी साहित्य कोश, भाग 2, ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी (भारतकोश पुस्तकालय) पृष्ठ संख्या: 411
  • चतुर्वेदी, परशुराम, उत्तरी भारत की संत परम्परा, संतकाव्य; संतबानी संग्रह, भाग पहिला, बेलवेडियर प्रेस, प्रयाग
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लेखक परिचय:-

पता: बाराबाँध, बलिया, उत्तर प्रदेश
लेखन: साहित्य (कविता व कहानी) एवं अर्थशास्त्र
संपर्कसूत्र: rajeevupadhyay@live.in
दूरभाष संख्या: 7503628659
फेसबुक: https://www.facebook.com/rajeevpens
अंक - 35 (7 जुलाई 2015)
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2 टिप्‍पणियां:

  1. भोजपुरी नहीं, अवधी में है भीखा साहब की सारी रचनाएं।

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    1. भीखा साहब की बानी की भाषा और शैली तुलसीदास जी से प्रभावित है अतः उनकी भाषा भोजपुरी और अवधी की मिश्रण हो गई है। तुलसीदास के बाद के अधिकतर भोजपुरी के संत कवियों पर तुलसीदास का स्पष्ट प्रभाव है। अतः इनको सिर्फ भोजपुरी या फिर अवधी या किसी अन्य भाषा की सामी में बाँधना उचित नहीं होगा। ये तो हमारी साझी विरासत हैं।

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