संपादकीय

हे पत्थर के मूरति - रसिक बिहारी ओझा 'निर्भीक'

भगवान के मूरति!
नीमन बा एह जमाना में
तूँ चुपचाप
मंदिर में बइठल रहऽ
टुकुर-टुकुर ताकत रहऽ
घरी घंटा बाजत रहे
जल ढरकत रहे
भोग लागत रहे
आ तूँ खा मति
असहीं सूँघऽ
लोग परसाद कहि
पावत रहे।
बाजार गरम बा
भाव चढ़ल बा
कहल सरल बा
कइल मोसकिल बा
जब तू खइबू
अउरू फरमइब
त के खिआई?
-एह जमाना में
जब अपने पेट पहाड़ बनल बा
जब अपने पेट भंसार बनल बा
असहीं ठीक बा
दूनों के धरम बाँचल बा। 
-----------------रसिक बिहारी ओझा 'निर्भीक'
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