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संपादकीय: अंक - 27 (12 मई 2015)


सभ्यता के बिकास के संगे बहुत कुछ होला; कुछ निमन होला तऽ कुछ बाऊर। कुछ अईसने भईल बा ए आधुनिक सभ्यता के बिकास के आपा-धापी में जेवना के केवनो ओर से ठीक ना कहल जा सकेला। ओही कुछ बाऊर चीझन में कचरा बा जेवन का गाँव, का शहर; हर जगह आज कचरा एगो बहुत बड़ परेसानी के कारन हो गईल बा। आज चारू ओर कचरा के ढेर लागल बा औरी सभ केहू एसे परेसान बा। 

ई कचरा घर क कूड़ा-कचरा होखे, उद्योग क कचरा होखे भा पलासटिक, रोज-रोज के जिनगी में हर बीतत दिन के संगे एकर रुप बिकराल होखत जात बा। अईसन नईखे कि आज से पहिले कचरा के परेसानी नईखे रहल। रहल; मगर रहन-सहन के बदलाव ए परेसानी के बढा देले बा। औरी अईसन बात नईखे कि ई केवनो एगो क्षेत्र भा देस क परेसानी बा। बाकी सगरी दुनिया एसे परेसान बे।
पंदरह-बीस बरीस पहिले अईसन हाल ना रहे। तब लोग-बाग बाज़ार जाए तऽ संगे झोरा ले के जाए भा दोकानदार कागज के खोखा में सामान देबे। लेकिन पलासटिक कऽ थईली अईला के बाद लोग-बाग झोरा भुला गईलें तऽ दोकानदार कागज के खोखा। मजबूर हो के सरकार के पलासटिक के थईली पर रोक लगावे के परल मगर केवनो बरिआर असर नजर नईखे आवत।
आज हाल ई बा कि सगरी दुनिया पलासटिक के घूरा बनि गईल बा। नदी होखे भा नाला, नारी होखे भा गली सभ जगह पलासटिक नजर आवत बा औरी एकरा कारन जाने केतने परेसानी के सामना करे परत बा लोग-बाग के। सङही जाने केतने रंग बेमारी औरी परयावरन नोकसान अलगा बा। ई सभ कुल्ह मिलि के जाने केवन-केवन परयावरन के नाया-नाया औरी सामाजिक परेसानी के जनम देत बा। 
तेज बिकास के भूख औरी बाजार के बढत परभाव से पलासटिक कऽ परियोग बहुत से बढत गईल औरी शहरन के देखा-देखी गाँवो ओही रसता पर निकल पड़ल बाड़न सऽ। समय आ गईल बा कि कुछ कईल जाओ।

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शामली के कांधला में जेवन कुछ भईल औरी जेङने भईल बहुत अफसोस वाला बात बे। अजब हाल बा आज कि कुछ लोग केवनो अफवाह उड़ा देता औरी हजारन लोग धरम के नाँव पर बटोरा के लोगन के मारे-पीटे लागत बाड़न औरी जब पुलिस रोके के कोसिस कईलस तऽ थाना पर हमला कऽ दिहल गईल। का कहलऽ जाई एकरा के? काँहा ले उचित बा ई? ओकरो ले अफसोस के बात बा कि ई समाचार माध्यमन खाती ई केवनो समाचार ना रहल। का समय नईखे आ गईल कि धरम के नाँव डर के रोजगार करे वाला लोगन के सवाल पूछल जाओ? एतना जरूर धियान रखीं कि मुसलमान भईला के मतलब ई नईखे मुसलमान ए देस में असुरक्षित बा औरी नाही धरम के नाँव पर कुछऊ करे के हक मिल गईल बा। ई देस, ई समाज सभकर हऽ औरी सभकर जोगदान जरूरी बा आगे जाए खाती औरी सभका ए देस नियम कानून माने के होई।
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दिल्ली सरकार समाचार माध्यमन पर एक तरह से रोक लगावे कोसिस करत बे जेवन ठीक नईखे। समाचार माध्यमन के काम बा समाचार देखावल औरी समाचार देखावल पर केहू के सजा ना दिहल जा सकेला। लेकिन सङही जरूरी बा कि समाचार माध्यम भी इमानदारी से काम करे।

अंक - 27 (12 मई 2015)
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