विविध

अंक - 17 (3 मार्च 2015)

आज मैना कऽ सतरहवाँ अंक रऊआँ सभ के सोझा पेस करत बढिया लागत बा। ए अंक में पाँच गो रचना बाड़ी सऽ। जेवना में दू गो कबिता, एगो लेख, एगो कहानी औरी एगो व्यंग्य बा। ई अंक रऊआँ सभ खाती।
- प्रभुनाथ उपाध्याय
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ताड़ पर से उतरल
खजूरे पर अँटकल
सपना के जंगल में
आगि कहीं दहकल। 
सपना...
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एके कोखी बेटा जन्मे एके कोखी बेटिया।
दू रंग नीतिया 
काहे कईल हो बाबू जी दू रंग नीतिया।
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डॉ० उमेशजी ओझा
प्रेम के चेहरा गोल रंग एकदम दुधिया, बाल करिया बादर निहन. उनका के देखि के अईसन बुझात रहे कि सरग से कवनो ईनार के परी जमीन प उतर आईल बिया. प्रेम के बाबूजी एगो नामी कम्पनी में मैनेजेर के पद पर काम करत रहले. उनका दुगो लईका आ एगो लईकी प्रेम रहली. दुनो लईका बड़ी तेज आ होनहार रहले. बाकी प्रेम माई बाप के दुलार पा के जिद्दी हो गईल रही. 
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मनबोध मास्टर दुखी मन से कहलें- असों होली ना मनाइब। मस्टराइन पूछली- काहें? उ कहलें- सूर्पनखा की नाक की चलते। बात सही बा। जहां-जहां गड़बड़ बा, बूझीं सूर्पनखा के नाक फंसल बा। हम्मन की प्रेम के, स्नेह के, आत्मीयता के, सहयोग के, सहानुभूति के, उपकार के, उदारता के, देशभक्ति के कवन सिला मिलल?
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कैथी एगो ऐतिहासिक लिपि ह, जेकरा के मध्यकालीन भारत में प्रमुख रूप से उत्तर-पूर्व आ उत्तर भारत में काफी बृहत रूप से प्रयोग कईल जात रहे ।विकिपीडिया के अनुसार खासकर आज के उत्तर प्रदेश आ बिहार के क्षेत्रों में इ लिपि में वैधानिक एवं प्रशासनिक काम करे जाये के प्रमाण मिलल बा। एकरा के भोजपुरी में "कयथी" या "कायस्थी", के नाव से जानल जाला। पूर्ववर्ती उत्तर-पश्चिम प्रांत, मिथिला, बंगाल, उड़ीसा आ अवध..... 
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