विविध

आदमी से आदमी अझुराइल बा

आदमी से आदमी अझुराइल बा।
सभे एक दोसरा से डेराइल बा॥

मिल्लत बेमउआर आज के दिन।
सभका मगज में भँग घोराइल बा॥

नाता-रिस्ता जड़ से टूट रहल बा।
जे जहाँ बा ऊहें से लूट रहल बा॥

एह बउरइला के कवन पारावारा बा?
सभे अपने खून के चिहुट रहल बा॥

जे चोर बा, ऊ चानी काटता।
जे साध बा ऊ सीत चाटता॥

उल्टा बह रहल बा गंगा के धार
दू दिन के बछुरुओ मूँड़ी झाँटता॥
--------------प्रभुनाथ सिंह
अंक - 20 (24 मार्च 2015)

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