संपादकीय

पोखरा - विवेकी राय

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राज भरपूर बा
नॉव मसहूर बा
काहे तू उदास पोखर
काहे मजबूर बा ?
तोहके बन्हावल केहू, तोहके सॅवारल केहू
हियरा क सुन्नर सपना, तोहके उरेहल केहू।
‘सरगे क सीढ़ी सोझे’ सोचि के बनावल केहू
तोहरा के देखि-देखि नैनवा जुरावल केहू।
आजू तोहर दाही ना, केहू तोहार मोही ना,
बाति-बीति गइली भइया, केहू तोरे छोही ना।
टूटलना जवानी जइसे सीढी छितराइल बाड़ी।
बेकसी गरीबी कादो भारी भहराइल बाड़ी।
पॉव का बेवाई अइसन फाटल दरार बाड़े
देखि नाहिं जाला हाय, उठती बजार बाड़े।
पोखरा के नाकि लट्ठा लाजे झुकि गइले
बरुजी बेचारी सारी चीख के चटकि रे गइली।
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फोरी के पलस्तर पाजी जामि गइले झाड़-झारी
कॉटा फहरवले दखिन ओरी भगभाँड़ भारी
काल मरकीलवना ईंट-ईंट के उघरले बाड़े
पोखरा चिअरले दाँत मुँह करीखवले बाडे़
जूग बीति गइले सूने तुलसी के चउरा बाड़े
खाँची भर पसरल फइलल घूर बा, गन्हउरा बाड़े
रंग उड़ि गइले बाकी तनले सिवाला बा
आसनी बिछली मकरी कोने-कोने जाला बा
भीतर से सालेवाला भारी-भारी काँटा बा
झंखे लखरउआँ ठाढ़े सूने सूना भींडा बा
कुहुकेले कबहीं-कबहीं कारी कोइलरि निरदइया
ठनकेले कबहीं-कबहीं गइया चरवहवा भइया
फूल पर किरिनिया कबहीं घूँघरू बजावत आवे
रनिया बसन्ती कबहीं बेनिया डोलावति आवे
सभके द तरी तू
जरि घरी-घरी तू
दुनिया धधाइलि तोहार
दिल्ली बड़ी दूर बा।

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