संपादकीय

अंक - 15 (17 फरवरी 2015)

आज मैना कऽ पनरहवाँ अंक रऊआँ सभ के सोझा पेस करत बढिया लागत बा। ए अंक में दू गो रचना बाड़ी सऽ। औरी दूनो के दूनो काब्य रचना हवी सऽ; रऊआँ सभ खाती। 
- प्रभुनाथ उपाध्याय
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का ले जैबो, ससुर घर ऐबो।। टेक।।
गाँव के लोग जब पूछन लगिहैं, 

तब तुम का रे बतैबो ।। 1।।
खोल घुंघट जब देखन लगिहैं, 
तब बहुतै सरमैबो ।। 2।।
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छोड़-छोड़ आसा अकेले नाव खोल रे।

ऊ खूब नीमन गइला पर जननी
लगेला सुहावन सुदूर वाला ढोल रे।
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