संपादकीय

अंक - 10 (13 जनवरी 2015)

आज रऊआँ सभ के सोझा मैना कऽ दसवाँ अंक परस्तुत बा। ।एह अंक में दू गो रचनाकारन कऽ रचना सामिल बा जेवना में से एगो गज़ल हऽ तऽ दूसरकी एगो आलोचना हऽ।
- प्रभुनाथ उपाध्याय
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दोसर भाखा आ साहित्य खानी भोजपुरियो में कविता के लिखनिहार लोग बेसी बा। हर भाखा आ साहित्य खानी भोजपुरियो में नीमन आ बाउर रचना के आवल आ स्वागत जारी बा। रचना सब में नयापन भी बाटे आ दोहरावन भी। नाया पुरान सब तरह के चीझ पढ़े क चाहीं। नाया पढ़े से रचना के मौजूदा गति,लय आ ट्रेंड के पाता चलत रहेला। साथ हीं पुरान पढला से शब्द संस्कार,"कहन" के तौर-तरीका आ मांटी के खांटी गंध से साक्षात्कार होखी।
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बूँद भर पानी के खातिर मन तरस के रह गइल
उमड़ के आइल घटा हालत प हँस के रह गइल॥

जब कि पथरा गइल कब से ई नजरिया हार के
आज उकठल काठ पर सावन बरस के रह गइल॥

हर जगह बालू के पसरल बा समुन्दर दूर तक
दूर से आइल ई पातर धार फँस के रह गइल॥
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