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अंक - 7 (11 नवम्बर 2014)

आज मैना कऽ सातवाँ अंक रऊआँ सभ के सोझा पेस करत बढिया लागत बा। ए अंक में दू गो रचना बाड़ी सऽ। औरी दूनो के दूनो काब्य रचना हवी सऽ; रऊआँ सभ खाती। 
- प्रभुनाथ उपाध्याय
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गवन ले जइहऽ, अभी तऽ उमिरिया बेवे काँच
दिन कुछु छोड़ि दऽ, सीखे के बावे सब बात॥
गवन ले जइहऽ॥

ससूरा के उँच-नीच अभी ना बुझाई
आँगन देखि-देखि मन ललचाई
दिनवा भेजइहऽ बादे, नऊआ के हाथ॥
गवन ले जइहऽ॥
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जहिया भइल गुरु उपदेस। 
अंग-अंग कै मिटल कलेस ।।1।।
सुनत सजग भयो जीव। 
जनु अगिनि परै घीव ।।2।।
घर उपजल प्रभु प्रेम। 
छुटिगे तब ब्रत नेम ।।3।।
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