संपादकीय

अंक - 4 (11 अगस्त 2014)

आज रऊआँ सभ के सोझा मैना के चऊथा अंक परस्तुत बा। निक लागता। उम्मीद बा कि मैना रऊआँ सभ के मन माफ़िक धीरे-धीरे आगे बढ़ रह बे। एहू अंक में खाली दू गो काब्य रचना बाड़ी सऽ। ए अंक में  धरीक्षण मिश्र जी कऽ 'शिवजी के खेती' औरी चन्द्रशेखर मिश्र जी कऽ 'गाँव क बरखा' रचना रऊआँ सभ खाती। 
- प्रभुनाथ उपाध्याय 
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साँप के हजार मुँह पाँच बा भतार मुँह 

सब घर-बार भूत प्रेत खचमचिया । 

एक पूत छव मुँह एक के हाथी के मुँह 
घरे भीखि रोजी कइसे जुटिहे खरचिया । 
सुसुकि सुसुकि गौरी बोलतारी शिव जी से 
शिव जी का सुनि सुनि आवतारी हँसिया । 
हँसिया के देखि गौरी करेली गुनान औरी 
                                                   शिव जी से बिनती करेली एक संसिया ।।1।।

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हमरे गाँव क बरखा लागै बड़ी सुहावन रे।।
सावन-भादौ दूनौ भैया राम-लखन की नाईं,

पतवन पर जेठरु फुलवन पर लहुरु कै परछाईं।

बनै बयार कदाँर कान्ह पर बाहर के खड़खड़िया,

बिजुरी सीता दुलही, बदरी गावै गावन रे।। हमरे.... 
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