संपादकीय

अंक - 2 (11 जून 2014)

आज रऊआँ सभ के सोझा मैना के दूसरका अंक पेस कईला में बडा निक लागत बा। रऊआँ सभ के उम्मीद से बढ़िया सहयोग से पहिलका अंक के मिलल जेवन हमके दूसरका खाती हिम्मत दिहलस। पहिलका अंक नियर एहू अंक में खाली दू गो काब्य रचना बाड़ी सऽ। जौहर शफियाबादी जी कऽ 'होला कबो बहार त पतझड़ जमीन पर' औरी 'कुबेरनाथ मिश्र 'विचित्र' जी के दूगो मुक्तक'। ई दूनू रचनन के बिसय आज बर्तमान के राजनैतिक औरी सामाजिक बदलाव के ओर अंगूरी देखावत साँच बोलत बाड़ी सऽ। एमे एगो गज़ल बे जेवन शफ़ियाबादी साहेब अपनी रवानगी में लिखले बानी तऽ मिसिर जी कऽ लिखावट आपन ढंग देखावत बा। 

- प्रभुनाथ उपाध्याय 
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होला कबो बहार त पतझर जमीन पर
देखेला खेल रोज ई अँखिगर जमीन पर॥


मोजर सिंगार देख के अइकत बा आम पर 
रोपले बा जे बबूर के रसगर जमीन पर॥
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उआँ अइतीं त अँगना अँजोर हो जाइत।
हमार मन बाटे साँवर ऊ गोर हो जाइत।


जवन छवले अन्हरिया के रतिया बाटे।
तवन रउरी मुसुकइला से, भोर हो जाइत।।
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