संपादकीय

कुरसी बदे - जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

अपना देशवा के हाल का बताईं गुरू।

एकरा रक्षा खातिर केकरा लग्गे जाई गुरू॥

उनका रहतब से अइसन ई आग लागल
मौत बेचे खातिर इंसान भइल पागल
रोजे अपहरण मरन होला खाली कुरसी बदे।
अइसन केतने खलिस्तानन के नाम हम गिनाई गुरू॥

उनके बुलट प्रूफ जाकिट मुबारक भइल
उ निरीहन के लेकिन संहारक भइल 
उ रोजे वाद चलावेलन खाली कुरसी बदे। 
अइसन केतने कमीसनन के नाम हम बताई गुरू॥ 

इहाँ से इज्जत अ नैतिकता के साया उठल
रथ के पहिया से मंदिर मस्जिद के माया उठल
एकरो मे केतनियों के जान गइल खाली कुरसी बदे।
ओकरा जांच खातिर कवन आयोग बैठवाई गुरू॥

उ रोजे विरोधी बनावत चलें 
जोड़ तोड़ के गणित बैठवात चलें 
रोजे कुकुर नियर लड़े खाली कुरसी बदे। 
अब नया कवन दल हम बनवाईं गुरू।
एकरा रक्षा खातिर केकरा लग्गे जाई गुरू ॥
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अंक - 80 (17 मई 2016)

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