संपादकीय

देश बा आपन धरती आपन - प्रभुनाथ सिंह

सबका में जब एक खून बा, अलग-अलग का मेला रे।


मन्दिर-मस्जिद, गुरुद्वारा में, एक बसे भगवान रे,
‘बड़का-छोटका, ऊँच-नीच’ कह, मत बाँटऽ इन्सान रे।
हर प्यासा के एके पानी, एक हवा हर साँस में,
मौसम कहिआ भेद लगवलस-आम, बबूर आ बाँस में।
नर के मान नारायण पूजऽ तू ढेला रे,
सबका में जब एक खून बा, अलग-अलग का मेला रे

पूजा-स्थल बहुत बनल, पर बन ना सकल इन्सान इहाँ,
गंगा जल त बहुत ढराइल, बाँचल कहाँ ईमान इहाँ
नफरत के आगी सुनगावे, आँधी अब अलगाव के,
मजहब इहवाँ पाठ पढ़ावे, घृणा आ टकराव के।
भय से थर-थर काँप रहल बा, गाँधी खड़ा अकेला रे,
सबका में जब एक खून बा, अलग-अलग का मेला रे

माँग सुरुज से प्यार किरिण, फइला पंजाब के माटी पर,
माँग चाँद से स्नेह-लेप, लगा कश्मीर के छाती पर।
पूछ गगन से एक डोर मे, बाँध ले चारों छोर के,
बना हृदय विशाल समुन्दर, धो दे सबका लोर के।
एक डार के पंछी हमस ब, एक गुरु के चेला रे,
सबका में जब एक खून बा, अलग-अलग का मेला रे

सत्य-अहिंसा के दीया के, घर-घर चलऽ जरावे,
मिल्लत के चादर कबिरा के, मिल-जल सभे बिछावे।
रहे ना केहू भूखा-नंगा, नया समाज बनावे,
मुश्किल परल आजादी के अब मंजिल तक पहुँचावे।
जीये के जाने मरम उहे, परमारथ राह धरेला रे
देश बा आपन, धरती आपन, काहे करे झमेला रे॥
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प्रभुनाथ सिंह
अंक - 81 (24 मई 2016)

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